माण्डू: अमर प्रेम का साक्षी / Mandu: Witness of immortal love

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यदि आप अप्रतिम नैसर्गिक सुषमा से ओत – प्रोत किसी ऐतिहासिक धरोहर पर विचार कर रहे हैं, तो सबसे पहले आपके जेहन में उभरने वाला नाम है – माण्डूगढ़। यहां मालवा अंचल की दुलर्भ संस्कृति के दशर्न होते हैं। यहां रूप – गुण की संयुक्त अनिंद्य रूपसी और संगीत की बेजोड़ गायिका रानी रूपमती और संगीत प्रेमी सुल्तान बाज बहादुर की प्रणय गाथा की अनुगूंज सुनायी देती है।
राजा भोज की  नगरी धार से 36 किमी की दूरी पर 1200 एकड़ भूभाग पर माण्डव बसा है। यह विंध्य क्षेत्र में 2000 फिट की ऊंचाई पर तीन तरफ से गहरी खाई से घिरा हुआ है। प्रेम – कथा और रमणीय एवं काव्यात्मक पर्यावरण का पर्याय यह न केवल मध्यप्रदेश या मालवा में, वरन् सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है। यह नगर कभी ’शादियाबाद’ के नाम से पहचाना जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है – आनंद का शहर। वर्षाकाल में मांडू का सौंदर्य कई गुणा बढ़ जाता है। चक्करदार घाटियों में वेग से बहती जलधारा और बीच में हरा – भरा मांडू, प्रकृति प्रेमियों को बहुत सुकून देता है।
क्या देखें: मांडू के दर्शनीय स्थल हैं – जहाज महल, हिंडोला महल, चम्पा बावड़ी, होशंगशाह का मकबरा, जामा मस्जिद, रूपमति का झरोखा, नीलकंठ आदि।
मांडू जाने का रास्ता उत्तर दिशा से होकर जाता है। भीतर – भीतर जाने के लिए पांच बड़े दरवाजे हैं, जिनमें सबसे बड़ा दरवाजा तो अब गिर गया है। दूसरा दरवाजा 96 मीटर ऊंचा और 4 मीटर घेरे वाला है, यहां लाल पत्थरों के बीच नीले पत्थरों की मीनाकारी सुंदर लगती है।
जहाज महल एक भव्य इमारत है, जो दो जलाशयों के बीच एक पतली पटरी पर कलात्मक ढ़ंग से बनी है। इसका आकार पूरा जहाज जैसा है, शायद इसी कारण इसे जहाज महल नाम दिया गया है। यह महल 111 मीटर लंबा, 95‐5 मीटर चैड़ा और लगभग 20 मीटर ऊंचा है। छत पर छोटे – छोटे बुर्ज और छज्जे हैं। चांदनी रातों में जलाशयों पर तैरती उसकी परछाईं, तैरते जहाज का आभास देती है। जिन जलाशयों के बीच यह महल बना है, वे राजा भोज की निशानी माने जाते है। भीतरी भाग में लाल – पीले पत्थरों की सजावट बड़ी रूचि से की गई है। रनिवास के सुंदर स्नानघर सम्राट के अमोदप्रियता के प्रतीक हैं।
हिंडोला महल स्थापत्यकला का एक अद्भुत नमूना है। यह देखने में हिंडोला जैसा ही लगता है। यह महल 34 मीटर लंबा, 18‐5 मीटर चैड़ा और 11 मीटर ऊंचा है, जिसका कुछ भाग आगे को निकला हुआ है, कहते हैं, यह मालवा के सुल्तानों का दिवानेखास था।
चम्पा बावड़ी के आस – पास कई महलों के पुरावशेष हैं। जनश्रुतियों के अनुसार प्राचीन समय में बावड़ी के अन्दर जाने का रास्ता उसके दोनों ओर बने दो छोटे – छोटे कमरों में से था। पास ही एक स्नानघर है, जिसमें गर्म और ठंडे पानी की व्यवस्था किसी जमाने में रहा करती थी। इसी बावड़ी के पास दिलावर खां की मस्जिद है, जहां शाही घराने के लोग नमाज पढ़ा करते थे।
जामा मस्जिद की इमारत अन्य इमारतों से बड़ी है। लगभग 500 वर्ष पुरानी यह इमारत अफगानिस्तान स्थापत्य कला पर आधारित है। इसकी लंबाई – चैड़ाई बराबर है। मस्जिद के दरवाजों तक जाने के लिए सीढ़ियां हैं। छत पर कुल मिलाकर 61 गुंबद हैं। पश्चिम की दिवार पर काले पत्थर पर सुंदर खुदाई देखने योग्य है। रेवाकुंड झील पवित्र मानी जाती है। उत्तर की तरफ पानी ऊपर चढ़ने की एक ऐसी चरखी लगी है, जिससे इसका पानी बाज बहादुर महल तक पहुंच जाया करता था। रूपमती ने इस झील को काफी चैड़ा और गहरा करवा दिया था।
दक्षिण में रूपमती का चैबारा है। कहा जाता है कि नर्मदा के प्रति रूपमती के मन में अपार श्रद्धा थी। वह नर्मदा का दर्शन किए बिना अन्न – जल ग्रहण नहीं करती थीं। महल के ऊपरी भाग में बने इस झरोखे से ही वह प्रतिदिन नर्मदा के दर्शन करती थीं।
रूपमती झरोखा सैनिकों के लिए बनाया गया था, जहां से सैनिक चारों तरफ नजर रखते थे। पहाड़ के शिखर पर 2 मंडप बने हुए हैं, जो कि रानी रूपमती केे एकांतवास या आध्यात्मिक साधना के स्थान थे। यहां के एक मंडप से रानी बाज बहादुर के महल को देखती थीं और दूसरे से नर्मदा के दर्शन करती थीं। यहां से निमाड़ का मैदानी भाग देखा जा सकता है।
अफगान वास्तु कला का सर्वाधिक परिष्कृत उदाहरण है होशंगशाह का मकबरा। इसकी मुख्य विशेषताओं में शामिल है, इसकी बहुत ही संतुलित और अनुपातिक गुंबदों की रचना, असाधारण और दर्शनीय संगमरमर की बारीक जालियों का निर्माण, चारों कोनों को प्रदर्शित करने के लिए 4 मीनारें और मंडपनुमा प्रांगण। कहते हैं कि मुगल शासक शाहजहां को ताजमहल का विचार इसे देखकर ही आया था।
यहां का नीलकंठ मंदिर भी दर्शनीय है। यह एक सुरम्य स्थान पर स्थित है। नीलकंठ महल मुगल शासन के दौरान निर्मित हुआ था, इसे मुगल गवर्नर शाह बगदाद खां ने अकबर की हिन्दू पत्नी के लिए बनवाया था। यहां पर पैदा होने वाली इमली विशेष किस्म की है। यह बहुत स्वादिष्ट होती है।
बाज बहादुर और रानी रूपमती के अमर  – पे्रम का साक्षी मांडू सचमुच बेजोड़ है। यहां के चप्पे – चप्पे पर भारतीय इतिहास बिखरा हुआ है।
                                                     स्वाति तिवारी


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