प्रकृति के आंगन में आस्थामय परिक्रमा – चार धाम / Faithful circumambulation in the courtyard of nature – Char Dham

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उत्तराखंड की सुरम्य पर्वत शृंखलाओं के मध्य स्थित श्री बदरीनाथ, श्री केदारनाथ, श्री यमुनोत्री और श्री गंगोत्री धाम चिरंतनकाल से श्रद्धालुओं को आकृष्ट करते रहे हैं और श्रद्धालुजन इन पावन स्थलों की यात्रा कर संतुष्ट होते रहे हैं। इन चार धामों में श्री बदरीनाथ धाम प्रमुख धाम है।
श्री बदरीनाथ धाम – श्री बदरीनाथ जी की पुण्य भूमि अलकनंदा और ऋषि गंगा के संगम पर स्थित है और यहीं है बदरी नारायण यानि भगवान विष्णु के अवतार का बसेरा।
यह पवित्र स्थल किसी समय बेरियों या ’बदरी’ की झाड़ियों से आच्छादित था, इसलिए इसका नाम बदरीनाथ पड़ गया। इसके दोनों ओर नर और नारायण पर्वत श्रेणियां हैं और यहां प्रविष्ट होते ही हिमाच्छादित नीलकण्ठ के उन्नत शिखर के दर्शन होते हैं।
बदरीनाथ मंदिर के ठीक सामने अलकनंदा नदी के किनारे तप्तकुण्ड नामक गर्म पानी का कुण्ड है। बदरीनाथ के आगे भारत – तिब्बत सीमा का अंतिम गांव माणा 4 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके समीप ही सुरम्य वसुंधरा जल प्रपात एवं व्यास गुफा है। कहते हैं कि भगवान वेद व्यास ने यहीं वेदों की ऋचाओं और मंत्रों का संग्रह कर उन्हें चार भागों में विभाजित किया था तथा अधिकांश पुराणों की संरचना भी यहीं हुई थी। महाभारत, स्कन्द पुराण एवं अन्य पुराणों में श्री बदरीनाथ की महिमा का विशद वर्णन किया गया है।
नवंबर के तीसरे सप्ताह से लेकर मई तक बदरीनाथ के कपाट बंद कर दिये जाते हैं और मंदिर के मुख्य पुजारी जोशीमठ चले जाते हैं, जो बदरी नारायण की शीतकालीन पीठ है।
अन्य दर्शनीय स्थल » असीम नैसर्गिक सौन्दर्य के अतिरिक्त बदरीनाथ के प्रमुख आकर्षण हैं सूर्य कुण्ड, नारद कुण्ड, माता मूर्ति मंदिर, शेष नेत्र मंदिर, उर्वशी मंदिर, चरणपादुका तीर्थ, गरूड़ शिला, नारद शिला, मारकण्डेय शिला, नृसिंह शिला, वाराह शिला, नीलकंठ पर्वत का मनोरम दृश्य, केशव प्रयाग, ब्रह्य कपाल, पंच धारा आदि।
श्री केदारनाथ धाम – केदारनाथ के तीन ओर गगनचुंबी शिखर खड़े हुए हैं। उसके बाद आगे के लिए कोई भी रास्ता दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है मानों हम धरती के आखिरी छोर तक पहुंच चुके हैं। केदारनाथ में केदार शिखर, भारखण्ड शिखर और खरचाखण्ड शिखर है। इन्हीं के बीच केदारनाथ तीर्थ है।
वर्तमान मंदिर को स्थापित करने का श्रेय 8वीं शताब्दी ईस्वी के महर्षि एवं धार्मिक सुधारक आदि शंकराचार्य जी को जाता है। इसमें अन्य शिवालयों के विपरीत, मूर्ति के रूप में एक करीब – करीब शंकु के आकार की चट्टान स्थापित है। प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष, जो वर्तमान मंदिर के पीछे देखे जा सकते हैं, पाण्डव युग के बताए जाते हैं।
मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदारनाथ के चारों ओर की घाटी बड़ी मनोहारी है। घाटी के निचले हिस्से में घने जंगल हैं, जो केदारनाथ अभयारण्य का एक हिस्सा है। दक्षिण की ओर एक पहाड़ी के शिखर पर भैरव जी का मंदिर है। केदारनाथ में अनेक कुण्ड हैं, जिनमें शिवकुंड मुख्य है। एक कुंड जो रूधिर कुंड कहलाता है, रक्तवर्ण जल से भरा रहता है। मंदिर के वाम भाग में पुरन्दर पर्वत है। इस क्षेत्र के मुख्य स्थान नारायण क्षेत्र, भिलंगण क्षेत्र, बागल क्षेत्र, शाकम्भरी क्षेत्र आदि हैं। तुंगनाथ, गोपेश्वर, रूद्रनाथ, कल्पनाथ आदि अन्य तीर्थ भी इसी क्षेत्र में स्थित हैं।
सर्दियों में भारी हिमपात के कारण केदारनाथ का याता्र मार्ग बंद हो जाता है।
अन्य दर्शनीय स्थल हैं »
शंकराचार्य जी की समाधि: केदारनाथ मंदिर के पीछे आदि शंकराचार्य जी की समाधि है।
भैरवनाथ मंदिर: मुख्य मंदिर के दक्षिण की ओर एक पहाड़ी पर भैरव जी का मंदिर है।
गांधी सरोवर: एक छोटी सी झील है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहीं से पाण्डवों में से सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था।
वासुकी ताल: 4,135 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह झील ऊंचे – ऊंचे पर्वतों से घिरी है और यहां से चैखम्बा का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है।
इसके अलावा नवदुर्गा मंदिर, शिव पार्वती प्रतिबिम्ब, स्वर्गारोहिणी, भीम गुफा, मधुगंगा आदि जैसे दर्शनीय स्थल भी हैं।
श्री गंगोत्री घाम – हिमालय के भीतरी प्रदेश में गंगोत्री मंदिर उस पावन शिला के निकट निर्मित है, जहां महाप्राण राजा भगीरथ भगवान शिव की अराधना किया करते थे। यहीं पर सर्वप्रथम देवी गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। किंवदन्ती है कि इसी स्थान के निकटवर्ती श्रीकांत पर्वत पर गंगा जी के अवतरण के लिए भगीरथ ने 5,500 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। भागीरथी यहां से कुछ दूर तक उत्तर की दिशा में बहती है, इसलिए इस स्थान को गंगोत्री कहते हैं। गंगा नदी यहां केवल 20 मीटर चैड़ी है।
नवंबर तक गंगोत्री धाम बर्फ से ढ़क जाता है, इसलिए गंगोत्री मंदिर की चल मूर्ति को 25 किमी नीचे मुखबा ले जाया जाता है, जिससे श्रद्धालुओं को दर्शन सुलभ हो सके। वैसे कड़कड़ाती ठंड के बावजूद अनेक साधू साल भर गंगोत्री में रहते हैं, यहां तक कि शीतऋतु में भी।
ग्ंागा का स्रोत – गंगोत्री हिमनद, अब घाटी से 19 किमी और ऊपर की ओर खिसक गया है और उसके मार्ग के निशान घाटी के किनारे – किनारे देखे जा सकते हैं। गौमुख इसी का मुंह है। गौमुख तक का रास्ता ढा़लू है और अनेक तीर्थयात्री नदी को उसके जाने – पहचाने स्रोत पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए यह यात्रा पैदल या टट्टुओं द्वारा करते हैं। भागीरथी  ऊंची – ऊंची पर्वतीय शृंखलाओं के बीच में दबी एक संकरी घाटी में से होकर बहती है। पर्वतारोहण से जुड़े कुछ जाने पहचाने नाम जैसे शिवलिंग, सतोपंथ आदि गंगोत्री को घेरे हुए हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल »
गंगोत्री मंदिर: भागीरथी के तट पर गंगा मां का प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण गढ़वाल के एक गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में करवाया था। बाद में जयपुर के महाराजा ने उसे पुनः बनवाया।
जलमग्न शिवलिंग: नदी में डूबा एक प्राकृतिक चट्टान का शिवलिंग है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वहां स्थित है, जहां भगवान शिव बैठे थे और उन्होंने गंगा जी को उलझी जटाओं में ग्रहण किया था।
गौरी कुंड: गंगा जी के मंदिर के नीचे लगभग एक फर्लांग की दूरी पर भागीरथी सीधी चट्टानों के बीच से झरना बन कर गिरती है।
पटांगण: गौरीकुंड से डेढ़ किमी नीचे जहां रूद्रगंगा और भागीरथी का संगम होता है, शिलाओं का समतल मैदान दिखाई देता है।
केदारनाथ संगम: गंगा जी के मंदिर से लगभग 100 कदम नीचे केदार गंगा केदार शिखर से बहती हुई आती है और भागीरथी से उसके बाएं तट पर आकर मिलती है।
देवघाट: गंगोत्री के पास जहां भागीरथी में केदार गंगा आकर मिलती है, वहा इसके ठीक सामने दो नीची शृंखलाएं नजर आती हैं। यही देवघाट कहलाती है।
श्री यमुनोत्री धाम – यमुना नदी का उद्गम स्थल यमुनोत्री गढ़वाल हिमालय का सबसे पश्चिमी तीर्थ स्थल है। यह स्थान 6, 315 मीटर ऊंचे बंदरपूंछ नामक उन्नत शिखर के पश्चिमी किनारे पर स्थित है, जो सदैव हिमाच्छादित रहता है। हनुमान गंगा तथा टोंस नामक नदियों का जल निर्गम क्षेत्र यही है। कहा जाता है कि असित मुनि की कुटी यहीं पर थी जो नित्य यमुना तथा गंगा, दोनों में स्नान किया करते थे। वृद्धावस्था आने पर जब वह गंगोत्री जाने में असमर्थ हो गए तो यमुनोत्री में उनके सामने शिलाखंडों में गंगा का एक रमणीय स्रोत प्रकट हो गया।
पर्वतों की भव्य पृष्ठभूमि में यमुना नदी के साथ – साथ चलने वाला मार्ग बेहद खूबसूरत है।
देवी यमुना का मंदिर यहां का प्रमुख आकर्षण है। मंदिर के निकट स्थित तप्त कुंड में लोग चावल या आलू कपड़े के किसी टुकड़े में ढ़ीले ढ़ंग से बांध कर डुबो देते है और थोड़ी देर बाद पूरी तरह पक जाने पर इसे प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं।
अन्य दर्शनीय स्थल »
यमुना जी का मंदिर: यह मंदिर 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में जयपुर की महारानी गुलेरिया ने बनवाया था। 1923 में मूर्तियों को छोड़कर इसे नष्ट कर दिया गया और इसका पुनर्निमाण किया गया। वैसे 1982 में इसे फिर काफी क्षति हुई।
चूंकि यमुना का स्रोत यहां से और आगे करीब 4, 421 मीटर की ऊंचाई पर है और वहां जाना अत्यंत कठिन है, इसलिए लोग मंदिर में ही अपनी पूजा करते हैं।  
सूर्य कुंड: मदिर के निकट ही गर्म पानी के कई स्रोत हैं, जहां पर्वत की खोहों से तीव्र गति से निकलने वाला उबलता हुआ पानी कुंडों में एकत्र होता है। इन कुंडों में सबसे महत्वपूर्ण सूर्य कुंड है।
दिव्य शिला: सूर्य कुंड के निकट यह एक पाषाण स्तम्भ है। यमुनोत्री मंदिर में प्रवेश करने से पहले इसकी पूजा की जाती है।
यात्रा के विविध मार्ग – उत्तराखंड (गढ़वाल) के तीर्थों तक पहुंचने के लिए हरिद्वार से यात्रा प्रारंभ करना शास्त्र सम्मत बताया गया है। धार्मिक यात्रा वामार्त होकर की जाती है। यहीं पर प्रत्येक तीर्थ यात्री को यह निर्णय लेना होता है कि वह कौन सी यात्रा पहले प्रारंभ करे। सामान्यतः आजकल ऋषिकेश से सीधे बदरीनाथ और केदारनाथ की यात्रा होने लगी है, परंतु शास्त्र विधि के अनुसार उत्तराखंड के चारों धामों की यात्रा के लिए ऋषिकेश से यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, फिर केदारनाथ और अंत में बदरीनाथ की यात्रा करनी चाहिए। ऋषिकेश से यात्री देवप्रयाग जाएं और देवप्रयाग में स्नान और पिण्डदान करने के बाद टिहरी होकर यमुनोत्री पहुंचें तो वह धार्मिक दृष्टि से उत्तम होगा। इस मार्ग को अपनाते हुए लोग टिहरी, धरासू, बड़कोट होकर यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ की यात्रा करते हैं।
पहला मार्ग है ऋषिकेश से देहरादून, मसूरी, बड़कोट होकर यमुनोत्री। ऋषिकेश से यमुनोत्री जाने के लिए दूसरा मार्ग नरेंद्र नगर, चम्बा, धरासू होते हुए जाता है तथा तीसरा मार्ग ऋषिकेश से लक्ष्मण झूला, वशिष्ठ गुफा, व्यासी, साकनीधार होते हुए देवप्रयाग, देवप्रयाग से टिहरी, टिहरी से धरासू, धरासू से बड़कोट, बड़कोट से सयाना, हनुमान चट्टी से फूल चट्टी, फूल चट्टी से जानकी चट्टी और जानकी चट्टी से यमुनोत्री जाता है।
                                      आलेख उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सौजन्य से
 प्रकृति के आंगन में आस्थामय परिक्रमा – चार धाम
उत्तराखंड की सुरम्य पर्वत शृंखलाओं के मध्य स्थित श्री बदरीनाथ, श्री केदारनाथ, श्री यमुनोत्री और श्री गंगोत्री धाम चिरंतनकाल से श्रद्धालुओं को आकृष्ट करते रहे हैं और श्रद्धालुजन इन पावन स्थलों की यात्रा कर संतुष्ट होते रहे हैं। इन चार धामों में श्री बदरीनाथ धाम प्रमुख धाम है।
श्री बदरीनाथ धाम – श्री बदरीनाथ जी की पुण्य भूमि अलकनंदा और ऋषि गंगा के संगम पर स्थित है और यहीं है बदरी नारायण यानि भगवान विष्णु के अवतार का बसेरा।
यह पवित्र स्थल किसी समय बेरियों या ’बदरी’ की झाड़ियों से आच्छादित था, इसलिए इसका नाम बदरीनाथ पड़ गया। इसके दोनों ओर नर और नारायण पर्वत श्रेणियां हैं और यहां प्रविष्ट होते ही हिमाच्छादित नीलकण्ठ के उन्नत शिखर के दर्शन होते हैं।
बदरीनाथ मंदिर के ठीक सामने अलकनंदा नदी के किनारे तप्तकुण्ड नामक गर्म पानी का कुण्ड है। बदरीनाथ के आगे भारत – तिब्बत सीमा का अंतिम गांव माणा 4 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके समीप ही सुरम्य वसुंधरा जल प्रपात एवं व्यास गुफा है। कहते हैं कि भगवान वेद व्यास ने यहीं वेदों की ऋचाओं और मंत्रों का संग्रह कर उन्हें चार भागों में विभाजित किया था तथा अधिकांश पुराणों की संरचना भी यहीं हुई थी। महाभारत, स्कन्द पुराण एवं अन्य पुराणों में श्री बदरीनाथ की महिमा का विशद वर्णन किया गया है।
नवंबर के तीसरे सप्ताह से लेकर मई तक बदरीनाथ के कपाट बंद कर दिये जाते हैं और मंदिर के मुख्य पुजारी जोशीमठ चले जाते हैं, जो बदरी नारायण की शीतकालीन पीठ है।
अन्य दर्शनीय स्थल » असीम नैसर्गिक सौन्दर्य के अतिरिक्त बदरीनाथ के प्रमुख आकर्षण हैं सूर्य कुण्ड, नारद कुण्ड, माता मूर्ति मंदिर, शेष नेत्र मंदिर, उर्वशी मंदिर, चरणपादुका तीर्थ, गरूड़ शिला, नारद शिला, मारकण्डेय शिला, नृसिंह शिला, वाराह शिला, नीलकंठ पर्वत का मनोरम दृश्य, केशव प्रयाग, ब्रह्य कपाल, पंच धारा आदि।
श्री केदारनाथ धाम – केदारनाथ के तीन ओर गगनचुंबी शिखर खड़े हुए हैं। उसके बाद आगे के लिए कोई भी रास्ता दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है मानों हम धरती के आखिरी छोर तक पहुंच चुके हैं। केदारनाथ में केदार शिखर, भारखण्ड शिखर और खरचाखण्ड शिखर है। इन्हीं के बीच केदारनाथ तीर्थ है।
वर्तमान मंदिर को स्थापित करने का श्रेय 8वीं शताब्दी ईस्वी के महर्षि एवं धार्मिक सुधारक आदि शंकराचार्य जी को जाता है। इसमें अन्य शिवालयों के विपरीत, मूर्ति के रूप में एक करीब – करीब शंकु के आकार की चट्टान स्थापित है। प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष, जो वर्तमान मंदिर के पीछे देखे जा सकते हैं, पाण्डव युग के बताए जाते हैं।
मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदारनाथ के चारों ओर की घाटी बड़ी मनोहारी है। घाटी के निचले हिस्से में घने जंगल हैं, जो केदारनाथ अभयारण्य का एक हिस्सा है। दक्षिण की ओर एक पहाड़ी के शिखर पर भैरव जी का मंदिर है। केदारनाथ में अनेक कुण्ड हैं, जिनमें शिवकुंड मुख्य है। एक कुंड जो रूधिर कुंड कहलाता है, रक्तवर्ण जल से भरा रहता है। मंदिर के वाम भाग में पुरन्दर पर्वत है। इस क्षेत्र के मुख्य स्थान नारायण क्षेत्र, भिलंगण क्षेत्र, बागल क्षेत्र, शाकम्भरी क्षेत्र आदि हैं। तुंगनाथ, गोपेश्वर, रूद्रनाथ, कल्पनाथ आदि अन्य तीर्थ भी इसी क्षेत्र में स्थित हैं।
सर्दियों में भारी हिमपात के कारण केदारनाथ का याता्र मार्ग बंद हो जाता है।
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शंकराचार्य जी की समाधि: केदारनाथ मंदिर के पीछे आदि शंकराचार्य जी की समाधि है।
भैरवनाथ मंदिर: मुख्य मंदिर के दक्षिण की ओर एक पहाड़ी पर भैरव जी का मंदिर है।
गांधी सरोवर: एक छोटी सी झील है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहीं से पाण्डवों में से सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था।
वासुकी ताल: 4,135 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह झील ऊंचे – ऊंचे पर्वतों से घिरी है और यहां से चैखम्बा का मनोहारी दृश्य दिखाई देता है।
इसके अलावा नवदुर्गा मंदिर, शिव पार्वती प्रतिबिम्ब, स्वर्गारोहिणी, भीम गुफा, मधुगंगा आदि जैसे दर्शनीय स्थल भी हैं।
श्री गंगोत्री घाम – हिमालय के भीतरी प्रदेश में गंगोत्री मंदिर उस पावन शिला के निकट निर्मित है, जहां महाप्राण राजा भगीरथ भगवान शिव की अराधना किया करते थे। यहीं पर सर्वप्रथम देवी गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। किंवदन्ती है कि इसी स्थान के निकटवर्ती श्रीकांत पर्वत पर गंगा जी के अवतरण के लिए भगीरथ ने 5,500 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। भागीरथी यहां से कुछ दूर तक उत्तर की दिशा में बहती है, इसलिए इस स्थान को गंगोत्री कहते हैं। गंगा नदी यहां केवल 20 मीटर चैड़ी है।
नवंबर तक गंगोत्री धाम बर्फ से ढ़क जाता है, इसलिए गंगोत्री मंदिर की चल मूर्ति को 25 किमी नीचे मुखबा ले जाया जाता है, जिससे श्रद्धालुओं को दर्शन सुलभ हो सके। वैसे कड़कड़ाती ठंड के बावजूद अनेक साधू साल भर गंगोत्री में रहते हैं, यहां तक कि शीतऋतु में भी।
ग्ंागा का स्रोत – गंगोत्री हिमनद, अब घाटी से 19 किमी और ऊपर की ओर खिसक गया है और उसके मार्ग के निशान घाटी के किनारे – किनारे देखे जा सकते हैं। गौमुख इसी का मुंह है। गौमुख तक का रास्ता ढा़लू है और अनेक तीर्थयात्री नदी को उसके जाने – पहचाने स्रोत पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए यह यात्रा पैदल या टट्टुओं द्वारा करते हैं। भागीरथी  ऊंची – ऊंची पर्वतीय शृंखलाओं के बीच में दबी एक संकरी घाटी में से होकर बहती है। पर्वतारोहण से जुड़े कुछ जाने पहचाने नाम जैसे शिवलिंग, सतोपंथ आदि गंगोत्री को घेरे हुए हैं।
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गंगोत्री मंदिर: भागीरथी के तट पर गंगा मां का प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण गढ़वाल के एक गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में करवाया था। बाद में जयपुर के महाराजा ने उसे पुनः बनवाया।
जलमग्न शिवलिंग: नदी में डूबा एक प्राकृतिक चट्टान का शिवलिंग है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वहां स्थित है, जहां भगवान शिव बैठे थे और उन्होंने गंगा जी को उलझी जटाओं में ग्रहण किया था।
गौरी कुंड: गंगा जी के मंदिर के नीचे लगभग एक फर्लांग की दूरी पर भागीरथी सीधी चट्टानों के बीच से झरना बन कर गिरती है।
पटांगण: गौरीकुंड से डेढ़ किमी नीचे जहां रूद्रगंगा और भागीरथी का संगम होता है, शिलाओं का समतल मैदान दिखाई देता है।
केदारनाथ संगम: गंगा जी के मंदिर से लगभग 100 कदम नीचे केदार गंगा केदार शिखर से बहती हुई आती है और भागीरथी से उसके बाएं तट पर आकर मिलती है।
देवघाट: गंगोत्री के पास जहां भागीरथी में केदार गंगा आकर मिलती है, वहा इसके ठीक सामने दो नीची शृंखलाएं नजर आती हैं। यही देवघाट कहलाती है।
श्री यमुनोत्री धाम – यमुना नदी का उद्गम स्थल यमुनोत्री गढ़वाल हिमालय का सबसे पश्चिमी तीर्थ स्थल है। यह स्थान 6, 315 मीटर ऊंचे बंदरपूंछ नामक उन्नत शिखर के पश्चिमी किनारे पर स्थित है, जो सदैव हिमाच्छादित रहता है। हनुमान गंगा तथा टोंस नामक नदियों का जल निर्गम क्षेत्र यही है। कहा जाता है कि असित मुनि की कुटी यहीं पर थी जो नित्य यमुना तथा गंगा, दोनों में स्नान किया करते थे। वृद्धावस्था आने पर जब वह गंगोत्री जाने में असमर्थ हो गए तो यमुनोत्री में उनके सामने शिलाखंडों में गंगा का एक रमणीय स्रोत प्रकट हो गया।
पर्वतों की भव्य पृष्ठभूमि में यमुना नदी के साथ – साथ चलने वाला मार्ग बेहद खूबसूरत है।
देवी यमुना का मंदिर यहां का प्रमुख आकर्षण है। मंदिर के निकट स्थित तप्त कुंड में लोग चावल या आलू कपड़े के किसी टुकड़े में ढ़ीले ढ़ंग से बांध कर डुबो देते है और थोड़ी देर बाद पूरी तरह पक जाने पर इसे प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं।
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यमुना जी का मंदिर: यह मंदिर 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में जयपुर की महारानी गुलेरिया ने बनवाया था। 1923 में मूर्तियों को छोड़कर इसे नष्ट कर दिया गया और इसका पुनर्निमाण किया गया। वैसे 1982 में इसे फिर काफी क्षति हुई।
चूंकि यमुना का स्रोत यहां से और आगे करीब 4, 421 मीटर की ऊंचाई पर है और वहां जाना अत्यंत कठिन है, इसलिए लोग मंदिर में ही अपनी पूजा करते हैं।  
स्ूार्य कुंड: मदिर के निकट ही गर्म पानी के कई स्रोत हैं, जहां पर्वत की खोहों से तीव्र गति से निकलने वाला उबलता हुआ पानी कुंडों में एकत्र होता है। इन कुंडों में सबसे महत्वपूर्ण सूर्य कुंड है।
दिव्य शिला: सूर्य कुंड के निकट यह एक पाषाण स्तम्भ है। यमुनोत्री मंदिर में प्रवेश करने से पहले इसकी पूजा की जाती है।
यात्रा के विविध मार्ग – उत्तराखंड (गढ़वाल) के तीर्थों तक पहुंचने के लिए हरिद्वार से यात्रा प्रारंभ करना शास्त्र सम्मत बताया गया है। धार्मिक यात्रा वामार्त होकर की जाती है। यहीं पर प्रत्येक तीर्थ यात्री को यह निर्णय लेना होता है कि वह कौन सी यात्रा पहले प्रारंभ करे। सामान्यतः आजकल ऋषिकेश से सीधे बदरीनाथ और केदारनाथ की यात्रा होने लगी है, परंतु शास्त्र विधि के अनुसार उत्तराखंड के चारों धामों की यात्रा के लिए ऋषिकेश से यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, फिर केदारनाथ और अंत में बदरीनाथ की यात्रा करनी चाहिए। ऋषिकेश से यात्री देवप्रयाग जाएं और देवप्रयाग में स्नान और पिण्डदान करने के बाद टिहरी होकर यमुनोत्री पहुंचें तो वह धार्मिक दृष्टि से उत्तम होगा। इस मार्ग को अपनाते हुए लोग टिहरी, धरासू, बड़कोट होकर यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ की यात्रा करते हैं।
पहला मार्ग है ऋषिकेश से देहरादून, मसूरी, बड़कोट होकर यमुनोत्री। ऋषिकेश से यमुनोत्री जाने के लिए दूसरा मार्ग नरेंद्र नगर, चम्बा, धरासू होते हुए जाता है तथा तीसरा मार्ग ऋषिकेश से लक्ष्मण झूला, वशिष्ठ गुफा, व्यासी, साकनीधार होते हुए देवप्रयाग, देवप्रयाग से टिहरी, टिहरी से धरासू, धरासू से बड़कोट, बड़कोट से सयाना, हनुमान चट्टी से फूल चट्टी, फूल चट्टी से जानकी चट्टी और जानकी चट्टी से यमुनोत्री जाता है।
                                      आलेख उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सौजन्य से


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