वन्य पर्यटन /Wild tourism

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वन्य पर्यटन यानि राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों की सैर प्रकृति व वन्य जन्तु सैलानियों के लिए एक विशेष आकर्षण है। प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठाते हुए दुर्लभ, विचित्र, रंग – बिरंगे जीव – जन्तुओं को करीब से देखना पर्यटकों को रोमांच से भर देता है।
वन्य पर्यटकों की संख्या पिछले कुछ वर्षों से तेजी से बढ़ रही है। इसी को मद्देनजर रखते हुए भारतीय पर्यटन विकास निगम एवं राज्य पर्यटन विकास निगमों ने वन्य पर्यटकों के ठहरने की उचित व्यवस्था हेतु वन विश्राम गृह, टूरिस्ट लाॅज जैसी सुविधाएं मुहैया कराई हैं। अब वन्य पर्यटकों को ठहरने के लिए किसी असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता है। इसके अलावा वन्य पर्यटक डारमेट्री में रह सकते हैं। उनके लिए टेंट में भी रहने की सुविधा है जो बेहद रोमांचकारी होता है। सभी राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों के खाने – पीने व वन्य भ्रमण की भी समुचित व्यवस्था है। भ्रमण के लिए प्रशिक्षित हाथी, सफारी वाहन व कुशल पथ प्रदर्शक भी उपलब्ध हैं। नए पर्यटकों को इनके साथ ही जाना चाहिए, क्योंकि इन्हें पूरी जानकारी होती है कि कौन सा जानवर कब किस स्थान पर मिलेगा। पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित विश्राम गृहों के अतिरिक्त सुविधा संपन्न प्राइवेट होटलों की संख्या भी दिन – ब – दिन बढ़ रही है। सरकारी विश्राम गृहों में सुविधा पाने के लिए चीफ वाइल्ड लाईफ वार्डेन या संबद्ध वन प्रभागीय कार्यालयों से अग्रिम बुकिंग करवा लेनी चाहिए।
वन संपदा के लिहाज से भारत एक धनी देश है। राष्ट्रीय उद्यानों की शुरूआत 1935 में हेली नेशनल पार्क से हुई। आज यह राष्ट्रीय उद्यान ’कार्बेट नेशनल पार्क’ के नाम से जाना जाता है। 1975 तक भारत में सिर्फ 5 राष्ट्रीय उद्यान थे,  लेकिन आज इनकी संख्या 100 से ऊपर है। इसके अतिरिक्त 500 से ज्यादा अभयारण्य हैं। राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों के विस्तार पर सरकार विशेष ध्यान दे रही है।
गुजरात और अंडामान के मेरीन नेशनल पार्क में समुद्री जीव जन्तुओं को संरक्षित किया गया है। यहां दुलर्भ प्रजाति के समुद्री जीव जन्तुओं को करीब से देखा जा सकता है। गुजरात में स्थित धारगडा अभयारण्य में जंगली गधों की दुलर्भ व लुप्तप्राय प्रजाति घुड़खर विशेष आकर्षण हैं। 40 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला ’केबुल लामजाओं’ राष्ट्रीय उद्यान मणिपुर राज्य में स्थित है। यह उद्यान हिरणों की दुर्लभ प्रजाति ’संगाई’ का निवास स्थल है।
भूटान की सीमा से जुड़े असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान में भारत की सबसे दुर्लभ प्रजातियांे के जीव जंतु पाए जाते हैं – जंगली भैंसा, हाथी, खरगोश, बौना सूअर, गोल्डन लंगूर, रीछ, घड़ियाल, अजगर इत्यादि।
सरकारी तौर पर 10 प्रतिशत राष्ट्रीय उद्यानों और 83 प्रतिशत अभयारण्यों में पर्यटकों को भ्रमण की अनुमति है। कुछ उद्यानों में पर्यटकों को वन्य जीवन से परिचित करवाने के लिए दृश्य – श्रव्य कार्यक्रमों के प्रदर्शन की सुविधा भी उपलब्ध है।
एक बात और ध्यान देने योग्य है कि सामान्य पर्यटन वन्य पर्यटन से बिन्कुल भिन्न है। दुर्लभ व खतरनाक वन्य जंतुओं को करीब से देखना अत्यंत जोखिम भरा काम है। किसी भी तरह की गलत हरकत आपका जीवन खतरे में डाल सकती है, इसीलिए राष्ट्रीय उद्यानों में भ्रमण के दौरान अपनी व राष्ट्रीय व वन्य प्राणियों की सुरक्षा हेतु वन्य पर्यटन नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वालों को भारी जुर्माना हो सकता है। राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों में शिकार की अनुमति नहीं है। इसलिए वहां आग्नेय हथियार ले जाना मना है। कुछ उद्यानों में शिकार का लाइसेंस चीफ वाइल्ड लाईफ वार्डेन से लिखित रूप में इजाजत मांगने व निर्धारित शुल्क अदा करने पर जारी किया जाता है।
राष्ट्रीय उद्यानों के भ्रमण के लिए कम से कम दो दिन का समय अवश्य रखें क्योंकि उद्यान में मौजूद सभी प्रजातियों के जीव जंतु एक ही दिन में दिखाई नहीं देते। जंगलों में जानवर अपनी मर्जी से यहां – वहां घूमते दिखाई देते हैं। किसी एक निश्चित स्थान पर उन्हें देख पाना असंभव है। हिमाच्छादित पहाड़ियों, हरी – भरी घाटियां, गगनचंुबी वृक्ष, इठलाती – बलखाती नदियां, जंगली पेड़ पौधों के इर्द – गिर्द मंडराते वन्य जीव पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। शेर, चीता, बाघ, भेड़िया जैसे कभी – कभार ही दिखाई देते हैं। दिखाई दे जाएं, तो अपना सौभाग्य समझिए। न दिखने पर निराश न होकर प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ उठाएं।
देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित वन्य उद्यानों के भ्रमण के लिए समय का चयन वहां के मौसम के अनुरूप करना चाहिए। जैसे पर्वतीय क्षेत्र में स्थित राष्ट्रीय उद्यानों की सैर के लिए गर्मी का मौसम उपयुक्त होगा। जाने से एक महीना या पंद्रह दिन पूर्व सरकारी वन्य विश्राम गृह में आरक्षण करवा लें। अपने पालतु जानवरों को घर पर ही छोड़कर जाएं। उद्यानों में उन्हें साथ ले जाने की अनुमति नहीं है।
साथ ले जाने के लिए सामान: अपने साथ गीले पेपर, नैपकिन व हैन्ड टाॅवेल ले जाएं, क्योंकि वहां की सड़कें असमतल व धूल भरी हैं। अपने साथ पर्याप्त मात्रा में पीने का पानी अवश्य रखें। खाने – पीने का सामान साथ ले जाना जरूरी होता है, लेकिन ध्यान रहे, न तो जंगली जानवरों को किसी प्रकार के खाद्य पदार्थ खिलाने की कोशिश करें, न ही खाने – पीने का बचा हुआ सामन यहां वहां फेंकें। वन्य पर्यटन नियमों के अनुसार यह जुर्म है। इसके लिए भारी जुर्माना भी हो सकता है। अपना कूड़ा अपने साथ वापस लाएं। प्लास्टिक बोतलें, पान मसाला व बिस्कुट चाॅकलेट के खाली रैपर अपने पास ही रखें। यहां वहां न फेंकें। कई राष्ट्रीय उद्यानों में प्रवेश द्वार पर अपना कूड़ा इकट्ठा करने के लिए प्लास्टिक की थैलियां उपलब्ध कराई जाती हैं, ताकि वे कूडा़ इधर – उधर न फेंककर, थैलियों के हवाले कर दें। राष्ट्रीय उद्यानों में डाॅक्टर तुरंत उपलब्ध नहीं होता। इसलिए प्राथमिक उपचार के लिए, फस्र्ट एड बाॅक्स अवश्य रखें जिसमें डेटाॅल, स्पिरिट, क्रोसीन, इलेक्ट्रॅाल, बैंडेज, आयोडेक्स इत्यादि हो। इसके अतिरिक्त हो सके तो प्राकृतिक नजारों व जानवरों के निरीक्षण के लिए दूरबीन अवश्य रख लें।
कपड़े व जूते: हल्के – फुल्के कपड़े पहनें। रंग का विशेष ध्यान रखें। जंगल में लाल – आॅरेंज जैसे तड़क – भड़क वाले रंग के कपड़े न पहनें। खाकी, भूरा, बादामी, सफेद, क्रीम जैसे रंग वन भ्रमण के लिए उपयुक्त हैं। तेज रंग से जानवर आतंकित होते हैं व भाग खड़े होते हैं। कभी – कभी झपट भी पड़ते हैं। चप्पल के बजाए जूते पहनें। ऊंची हील के जूते व चप्पल बिल्कुल न पहनें। स्पोर्ट शूज ही उपयुक्त हैं। इन्हें पहनकर दूर तक चला व दौड़ा जा सकता है।
उद्यान में फोटोग्राफी करने व वीडियो कैमरा ले जाने के लिए लिखित अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। निर्धारित शुल्क अदा करने पर अनुमति मिल जाती है।
भ्रमण कैसे करें: राष्ट्रीय उद्यानों में भ्रमण के लिए हाथी सबसे उपयुक्त है। अधिकतर उद्यानों में पर्यटकों को घुमाने के लिए प्रशिक्षित हाथियों की व्यवस्था है। अपनी साइकिल, स्कूटी या बाईक से घूमने का कार्यक्रम न बनाएं। इन वाहनों को उद्यान क्षेत्र में ले जाने की अनुमति नहीं है। कार द्वारा भ्रमण कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए वाइल्ड वार्डेन से लिखित अनुमति लेनी होती है। अनुमति मिलने पर अपने साथ प्रशिक्षित गाइड अवश्य ले जाएं। भ्रमण के समय कार के शीशे ऊपर चढ़ा दें। हार्न बिल्कुल न बजाएं। कार खड़ी होने पर बिना सोचे – समझे एकदम से नीचे न उतरें। शाम ढ़लने के बाद उद्यान में गाड़ी चलाना मना है। रात्रि के समय वाहन की हेड लाइट जलाने की भी अनुमति नहीं है। इससे पशुओं की शांति में खलल पड़ता है। कई बार वे डर जाते हैं। इसलिए सांझ ढ़लने से पहले लौट आएं। पर्यावरण सुरक्षा हेतु उद्यानों में डीजल से चलने वाले वहनों को ले जाने की अनुमति नहीं है।
रेडियो, टेप रिकार्डर या अन्य किसी वाद्य यन्त्र को उद्यान क्षेत्र में ले जाने व बजानेे की अनुमति नहीं है। इससे जंगली जानवर उत्तेजित होते हैं व उनकी शांति में खलल पड़ता है। राष्ट्रीय उद्यानों में धूम्रपान निषेध है।
भ्रमण के दौरान अपनी आंखें, कान व नाक चैकस रखें। जानवरों की आवाज से अंदाजा लगाएं कि वे किस जगह मौजूद हैं व उनका मूड कैसा है। जानवरों के पांवों के निशानों से भी पता लगा सकते हैं कि वे किस दिशा में होंगे। वन्य प्राणियों को देखने का उपयुक्त समय प्रातः व सायंकाल है। नदियों व तालाबों के आसपास बने मचानों से जानवरों को करीब से देखने का लुत्फ उठाया जा सकता है।
                                          मनजीत कौर भाटिया 


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