प्यार आता है दबे पांव

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बालकनी की कुर्सी पर निढ़ाल बैठी सुषमा का मन उदासी से भर गया। अभी – अभी पढ़कर पूरे किए गए उपन्यास को एक किनारे रखकर वह एकटक बाहर बगीचे की ओर ताकने लगी। किशोर प्रेम की एक दीर्घकथा के करूण अंत ने उपन्यास के पात्रों के लिए उनके मन में अपार सहानुभूति जगा दी थी। वे काल्पनिक पात्र जैसे उसके लिए जीते जागते आत्मीय बन गए थे। बालकनी के ठीक नीचे फूलों का बगीचा है। मौसमी फूलों के साथ साथ आम, जामुन और कटहल के भी कुछ पेड़ हैं। तरह तरह की चिड़िया बगीचे में आकर डेरा डाल लेती है। अभी जोड़ा फुदक फुदक कर आम के पेड़ की डाल पर आ बैठा। पहले नर गौरेया कहीं से आकर डाल पर बैठा, फिर अचानक एक और गौरेया फुदककर उसके निकट आ बैठी। यह मादा गौरेया थी। जरूर उसकी चहेती रही होगी, मादा गौरेया की चोंच में कोई चारा था जिसे उसने आगे बढ़कर बड़े प्यार से नर गौरेया की ओर बढ़ा दिया। सुषमा को यह देखकर अच्छा लगा। वह सोचने लगी, क्या पक्षियों में भी प्यार होता है ? क्या उपन्यास के नायक नायिका की तरह वे भी सपने बुनते हैं ? शायद सही मायने में मनुष्यों में ही प्यार नाम की चीज होती है। लेकिन पशु – पक्षियों का आपसी व्यवहार देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें प्यार नहीं होता। उनके बीच जो रागात्मक संबंध  होता है, उसे सीधे सीधे प्यार का नाम न भी दें, लेकिन एक तरह का लगाव तो हम देखते ही हैं। उनके आपसी व्यवहार को देखकर हमें इस लगाव का अनुमान सहज ही हो सकता है।आधुनिक युग में हम चीजों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने के आदी हो गए हैं। आखिर विज्ञान इस मामले में क्या कहता है ? वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे शरीर में हाईपोथैलमस नाम की गं्रथी होती है, जो हमारे मन में प्यार तथा हृदय से संबंधित भावनाओं को नियंत्रित करती है। इस गं्रथी के अंदर काम की अनुभूति के कारण ही प्यार का जन्म होता है। प्रत्येक नर और मादा वंशवृद्धि के लिए एक दूसरे से मिलते हैं। मनुष्य के मामले में इसके साथ ही और भी मानवीय संवेदनाएं जुड़ जाती हैं। बहुत दिनों से सागर सोच रहा है कि वह अपने मन की बात मधु से कह डाले। लेकिन मधु के निकट आते ही वह बिलकुल नर्वस हो जाता है। पहले से सोची हुई सारी बातें मधु के सामने गड़बड़ा जाती हैं। नतीजा यह है कि एक दूसरे को देखकर थोड़ा हंसने मुस्कराने से आगे बात नहीं बढ़ पाती। काॅॅलेज से लौटकर दोस्तों से थोड़ी देर गपशप करने के बाद अपने एकांत में वह केवल मधु के ही बारे में सोचता रहता है। इन क्षणों में वह सामान्य जीवन की छोटी मोटी बातों से बेखबर, अपनी प्रेमिका के साथ चांद तारों की दुनिया में सैर करता है। एक दिन इस खोई खोई हालत में सागर की मां ने देख लिया था। उन्होंने उसे टोक दिया, “तुझे यह क्या हो गया है ?“ मां की आवाज कान में पड़ते ही सागर की तंद्रा टूट गई और उसका सपना बिखर गया। मन ही मन मां पर रोष भी आया।कभी कभी सागर यह सोचकर चिंतित हो जाता है। वह तो मधु को लेकर न जाने क्या क्या सपने बुनता रहता है, लेकिन क्या मधु भी उसके बारे में ऐसे ही सोचती है ? कहीं वह किसी दूसरे से प्यार तो नहीं करती ? इन दुविधाओं से मन इतना बोझिल रहता है कि वह प्रयत्न करने पर भी मधु से खुलकर अपने मन की बातें नहीं कह पाता।प्रेम की प्रारम्भिक अवस्था में ऐसी मुश्किलें आती ही हैं। यह समझना बड़ा मुश्किल होता है कि कौन किसका मनपसंद साथी सिद्ध होगा। एक लड़का जिस लड़की को प्यार करता है, वह लड़की भी क्या उसे चाहती है, यह जानना जरूरी है। हर व्यक्ति अपनी पसंद के अनुसार अपने प्यार की दुनिया बसाता है। यह एक मजेदार बात है कि पूरी तरह सयाना होने से बहुत पहले, बचपन में ही, आदमी के मन में प्यार की नींव पड़ जाती है। अपने परिवार और आसपास की दुनिया को देखकर धीरे धीरे यह ज्ञान मन में पैदा होने लगता है।यह निर्विवाद है कि सभी लोग अपनी पसंद के अनुसार विवाह करना चाहते हैं। इसका कारण है कि हर आदमी अपनी स्वभावगत अच्छाइयों और बुराइयों को अपने प्रेमी या प्रेमिका के व्यक्तित्व में भी देखना चाहता है।विवाह से पहले अरूणा के प्यार में सतीश को अपनी दिवंगत मां के प्यार दुलार का विकल्प दिखाई देता है। उसकी उम्र नौ वर्ष की रही होगी, जब मां का देहान्त हुआ था। अपने हमजोलियों की भरी भरी जिंदगी देखकर उसे मां का अभाव बेहद खटकता। अरूणा ने जैसे मां की वह रिक्तता पूरी कर दी थी। उसके संपर्क में आने पर उसे लगता जैसे जीवनभर का उसका वह अभाव दूर हो गया है। लेकिन विवाह के बाद दैनिक जीवन में वे ज्यों ज्यों निकट होते गए, सतीश को अपनी भूल महसूस हुई। असल में वह पहली नजर में ही उसके पे्रम में पड़ गया था, और अधिक कुछ जानकारी प्राप्त करने का मौका ही नहीं मिला। जो बातें उन दोनों को नजदीक ले आई थीं, वे ही अब बनावटी लगने लगीं। अरूणा के प्यार में उसे अब मां की वह झलक भी नहीं मिल पाती थी।पुरूष मन ही मन एक आदर्श पत्नी की कल्पना करता है, पर व्यवहारिक दुनिया में जो स्त्री उसे पत्नी रूप में मिलती है, वह कल्पित आदर्श से कुछ भिन्न होती है। कुछ लोग जब अपनी पूर्व कल्पित उपेक्षाओं का अभाव अपनी पत्नी में पाते हैं, तो उसके बारे में सोच सोच कर समस्याएं खड़ी कर लेते हैं। आम तौर पर पति पत्नी एक दूसरे पर अपनी भावनाएं थोपने की चेष्टा करते हैं। इसका मतलब तो यह हुआ कि हम किसी व्यक्ति विशेष से प्यार न करके अपने निकट के व्यक्ति पर अपने कल्पित पे्रमी का प्रतिरोपण करते हैं।हमारी असफला की शुरूआत वहीं से हो जाती है, जब हम अपने साथी को अपनी मान्यताओं और विचारधारा की परिधि में खींचने की कोशिश करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में जोर जबरदस्ती करने पर मन ही मन दूरी बढ़ने लगती है। दरअसल, जब हमारा प्रेमी या पे्रमिका हमारी कल्पनाओं पर खरा नहीं उतरता, तभी गड़बड़ शुरू हो जाती है। प्यार की दुनिया में पैर रखने पर कई बार गहरी हताशा होती है। इसका कारण है मन की सूक्ष्म अनुभूतियों से हम सब भी अपरिचित होते हैं। प्यार की समस्या बहुत ही व्यक्तिगत और आत्मकेंद्रित होती है, पे्रम के आवेश में कभी – कभी कोई अपनी पे्रमिका को अलौकिक देवी के स्तर पर प्रतिष्ठित कर बैठता है। लेकिन अगले दिन जब उसे पता चलता है कि उसकी प्रेमिका सब्जी का झोला लेकर बाजार में सब्जी वाले से पांच – पांच पैसों के लिए तकरार करती है या बस की लाइन में खड़ी दूसरों से लड़ झगड़ बैठती है, तो पे्रमी को बड़ी निराशा होती है।यदि हम चाहें कि हमारा घरेलू जीवन बेचैनी, चिंता और अस्थिरता से मुक्त होकर सुख शान्तिमय हो, तो हमें पहले अपने दृष्टिकोण को साफ और तर्कसंगत बनाना पड़ेगा। दैनिक जीवन को किताबी ज्ञान के बल पर नहीं जिया जा सकता। जिंदगी पुस्तकों में लिखे नियमों के अनुसार नहीं चलती। हम अपने बच्चों को किताबों में प्रकाशित पे्रम या काम संबंधी जानकारियों की शिक्षा नहीं देते। अपने जीवन में वास्तविक रूप से हम जो जीते, भोगते सीखते हैं, वह भी तो ठीक ठीक बच्चों को कहां समझा पाते हैं।किसी भी पति पत्नी या प्रेमी प्रेमिका को आदर्श जोड़ी नहीं कहा जा सकता। कुछ मेल कुछ बेमेल को मिलाकर ही जीवन की गाड़ी चलती है।इसलिए यदि हम थोड़ा त्याग करके, थोड़ा समझौता करके चलने की कोशिश करें तो हमारी कई समस्याएं आप ही आप हल हो जाएंगी। अपने निजी प्रयत्नों से ही हम एक स्वस्थ, स्वाभाविक जीवन जीने और सुखी दाम्पत्य की शर्त पूरी कर सकते हैं।                                                       


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