मैं मजबूर थी

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घटना 1980 के दशक की है। रश्मि अग्रवाल पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में गृह विज्ञान विभाग में खाद्य तथा पोषण विषय में एमएससी अंतिम वर्ष की छात्रा थी। वह कस्तूरबा छात्रावास के कमरा नम्बर 47 में अपने ही विभाग की पद्मा पांडे के साथ रहती थी। कुमारी पद्मा उन दिनों अपने अभिभावकों के पास बरेली गई हुई थी। उसकी अनुपस्थिति में गृह विज्ञान की ही छात्रा रीता गुलाटी रश्मि के कमरे में रह रही थी। रीता भी कस्तूरबा छात्रावास में रहती थी। 23 जुलाई की सुबह रीता और रश्मि ने कमरे में ही एक साथ नाश्ता किया था। लगभग साढ़े नौ बजे रीता अपनी पढ़ाई के लिए गृहविज्ञान विभाग जाने लगी, तो उसने रश्मि से पूछा “दीदी आप भी चलेंगी।“

“नहीं मुझे कुछ काम है, बाद में आऊंगी।“ रश्मि ने कहा। रीता गृहविज्ञान विभाग चली गई थी। वहां से वह लगभग साढ़े बारह बजे लौटी। “दीदी चलिए, खाना खाने चलें। मुझे बहुत तेज भूख लगी है।“ कहते हुए रीता ने जैसे ही कमरे का दरवाजा खोला उसके कदम जहां के तहां थम गए। दरवाजे के ठीक सामने फर्श पर रश्मि औंधे मुंह पड़ी थी। उसके मुंह के करीब काफी मात्रा में उलटी पड़ी थी।

“दीदी बेहोश पड़ी हैं, दीदी बेहोश पड़ी हैं“ बदहवास सी चीखती हुई रीता नीचे की ओर भागी। रीता की चीख सुनकर छात्रावास की तमाम छात्राएं घबराकर अपने अपने कमरों से बाहर सीधे सहायक वार्डन श्रीमती चन्द्रा अरोरा के पास जा पहुंची। रीता ने रश्मि के बेहोश पड़े होने की बात बताई। उनके पीछे छात्राओं का समूह था।

जिस समय रश्मि की बेहोशी को लेकर छात्रावास में हड़कंप मचा, ठीक उसी समय विश्वविद्यालय के पादप रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर वाई. पी. एस. राठी अपनी मारूति कार से उधर से गुजर रहे थे। छात्राओं के अनुरोध पर, बेहोश रश्मि को वह तुरंत विश्वविद्यालय चिकित्सालय ले गए। वहां जांच करते ही डाॅक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यह घटना पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के कस्तूरबा महिला छात्रावास में गत 23 जुलाई को दोपहर साढ़े बारह बजे के करीब घटी थी।

रश्मि की मौत की खबर ने विश्वविद्यालय परिसर में सनसनी फैला दी। कुलपति डाॅ. महातिम सिंह उस दिन पंतनगर में नहीं थे। कुछ देर बाद विश्वविद्यालय के सुरक्षा अधिकारी ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस ने रश्मि के शव का पंचनामा कर पोस्ट मार्टम के लिए हल्द्वानी भेज दिया। रश्मि पीलीभीत के मोहल्ला शेख चंद की रहने वाली थी। इत्तिफाक से उसी समय रश्मि क चचेरा भाई मनोज उसके लिए मिठाई लेकर छात्रावास परिसर में पहुंचा था। पीलीभीत निवासी मनोज पंतनगर विश्वविद्यालय में ही बीटेक का छात्र था। रश्मि को विश्वविद्यालय के चिकित्सालय ले जाते देखकर मनोज भी वहां पहुंच गया था। जब चिकित्सकों ने रश्मि की मृत्यु होने की पुष्टि कर दी, तो मनोज ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि उसे कोई वाहन उपलब्ध कराया जाए, ताकि वह पीलीभीत जाकर रश्मि के घरवालों को इसकी सूचना दे सके। मनोज को विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक जीप दोपहर दो बजे दी।

मनोज लगभग सवा चार बजे पीलीभीत पहुंचा। रश्मि के पिता गोपालशरण अग्रवाल की शहर के जे पी रोड पर ‘अप्सरा जनरल स्टोर्स‘ नामक दुकान है। वह दुकान पर ही मौजूद थे। मनोज ने उन्हें बताया कि रश्मि दीदी बेहोश हो गई हैं। श्री अग्रवाल दुकान से ही मनोज के साथ पंतनगर के लिए रवाना हो गए। उन्होंने दुकान पर मौजूद अपने पुत्र अरूण को कह दिया कि वह घर जाकर बता दे।

सायं लगभग सवा छः बजे गोपालशरण अग्रवाल पंतगनर विश्वविद्यालय के चिकित्सालय पहुंच गए। विश्वविद्यालय के ही एक प्रोफेसर वी. एस. अग्रवाल भी तब तक वहां आ गए। प्रोफेसर अग्रवाल रश्मि के स्थानीय अभिभावक थे। उन्हें देखते ही गोपालशरण अग्रवाल बोले, “कहां है मेरी रश्मि ? मुझे रश्मि से मिलाओ। शायद मानसिक प्रताड़ना के कारण उसे आघात लगा है। उसकी मौसी सुधा गुप्ता रामपुर गार्डन (बरेली) में डाॅक्टर है। मैं एम्बुलेंस से रश्मि को वहां ले जाकर इलाज करा लूंगा।“
तब प्रोफेसर वी. एस. अग्रवाल उनके कंधे पर हाथ रखकर भरे गले से बोले, “रश्मि अब इस स्थिति में नहीं है कि उसे अस्पताल ले जाया जा सके। उसकी मृत्यु हो चुकी है।“ यह सुनते ही श्री अग्रवाल सन्न रह गए, फिर रो पड़े। विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारी उन्हें डाॅक्टर के कमरे में ले गए। रश्मि का शव वहां नहीं था। रश्मि का शव देखने की जिद करने पर उन्हें कस्तूरबा छात्रावास ले जाया गया। वहां पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) रश्मि के कमरे की जांच कर रहे थे। श्री अग्रवाल को कमरे में नहीं जाने दिया गया।

गोपालशरण अग्रवाल ने लालकुंआ थाने में एक रिपोर्ट दर्ज कराई, जो इस प्रकार थी, “मेरी पुत्री कुमारी रश्मि अग्रवाल पंतनगर विश्वविद्यालय मंे एमएससी गृहविज्ञान की अंतिम वर्ष की छात्रा थी। वह विश्वविद्यालय के ही कस्तूरबा छात्रावास में रहती थी। वह सहायक प्राध्यापिका श्रीमती उमा कोहली की देख रेख में अपना शोधपत्र लिख रही थी, जो लगभग पूरा हाने को था। विश्वविद्यालय के ही कंट्रोलर एस. के. शर्मा की लड़की शुचिस्मिता जेटली मेरी लड़की से एक वर्ष जूनियर है।“

“गृहविज्ञान विभाग की डीन मिस एम. एस. ऊषा तथा एस. के. शर्मा के गहरे और करीबी संबंध हैं। इन दोनों के कहने और जोर डालने पर श्रीमती कोहली पिछले छः माह से रश्मि को बहुत परेशान करने लगी थी। वह चाहती थीं कि रश्मि अपना शोधपत्र शुचिस्मिता जेटली को दे दे। चूंकि रश्मि ने शोधपत्र पर लिखने में काफी मेहनत की थी, अतः वह उसे किसी अन्य को देने को तैयार नहीं थी। इस संबंध में मेरी लड़की ने मुझे कई बार बताया था। मैनें उपरोक्त लोगों से इस संबंध में बात भी की थी।“

“कोई पन्द्रह दिन पूर्व रश्मि ने मुझे पंतनगर बुलाकार बताया था कि श्रीमती कोहली उसे बहुत परेशान करती थीं। कहती थीं कि अपना शोधपत्र कुमारी जेटली को दे दो, वरना तुम्हारा साल बेकार कर दिया जाएगा और बदनामी भी की जाएगी। रश्मि बहुत परेशान नजर आ रही थी। मैनें श्रीमती कोहली से बात की, तो उन्होंने कहा, “आप जाइए, अब ऐसा नहीं होगा।“ मेरी लड़की से श्रीमती कोहली ने शोधपत्र जांचने के बहाने ले लिया था। रश्मि शोधपत्र वापस मांगने गई, तो श्रीमती कोहली ने वापस नहीं किया। साथ ही उसे प्रताडि़त किया। आज शोधपत्र जमा करने की अंतिम तिथि थी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी लड़की ने श्रीमती कोहली के दुव्र्यवहार तथा लगातार प्रताडि़त किए जाने से परेशान होकर आत्महत्या की है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी श्रीमती कोहली की है।“

श्री अग्रवाल ने थाने से लौटकर विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों से रश्मि का शव दिखाने का पुनः आग्रह किया। अधिकारियों द्वारा टालने पर वह फूट फूट कर रोने लगे। तब श्री अग्रवाल को हल्द्वानी ले जाया गया। रात लगभग बारह बजे उन्हें रश्मि का सीलबंद शव सौंप दिया गया। अगले दिन पीलीभीत में रश्मि का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

उधर जब लालकुंआ पुलिस ने रश्मि के कमरे की तलाशी ली, तो उसे रश्मि की व्यक्तिगत डायरी के नीचे लिफाफे में रखे बंद तीन पत्र मिले। एक पत्र विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ महातिम सिंह, दूसरा गृहविज्ञान की डीन मिस एम एस ऊषा और तीसरा गोपलशरण अग्रवाल के नाम था।

24 जुलाई को जब कुलपति डाॅ महातिम सिंह पंतनगर लौटे, तो उन्हें घटना की जानकारी मिली। विश्वविद्यालय के छात्र उत्तेजित हो रहे थे। यह देखकर कुलपति ने विश्वविद्यालय के तीन वरिष्ठ प्रोफेसरों की एक जांच समिति गठित कर दी। जांच में श्रीमती उमा कोहली को रश्मि को प्रताडि़त करने का दोषी पाया गया था।
अगले दिन 26 जुलाई को मिस ऊषा और श्रीमती कोहली ने पुलिस की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में हल्द्वानी जाकर अतिरिक्त मुंसिफ मजिस्ट्रेट आर. सी. चैधरी की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया। अदालत के बाहर इन दोनों प्राध्यापिकाओं के विरूद्ध नारेबाजी करती हुई छात्रों की भारी भीड़ थी। मजिस्ट्रेट श्री चैधरी ने श्रीमती कोहली और मिस ऊषा की जमानत रद्द कर दी। उस दिन दोनों को हल्द्वानी जेल भेज दिया गया। इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने श्रीमती कोहली को दोषी पाकर निलम्बित कर दिया।

रश्मि आत्महत्या कांड की जांच लालकुंआ थाने के उपनिरीक्षक जमील मोहम्मद रावत को सौंपी गई थी। 28 जुलाई को जांच अधिकारी रावत रश्मि के घर पीलीभीत गए। रश्मि ने जो पत्र अपने पिता को लिखा था, वह उपनिरीक्षक रावत और गोपालशरण के समक्ष खोला गया।

पत्र में लिखा था –
“आदरणीय पापाजी, मैं जो कुछ करने जा रही हूं , उसके लिए बेहद क्षमाप्रार्थी हूं। लेकिन मैं इस नतीजे पर बहुत सोच समझकर पहुंची हूं। जैसा आपने कहा था कि यदि एडवाइजर (शोध सलाहकार) ज्यादा परेशान करे, तो वापस आ जाना। पापा, मैं चुपचाप वापस चली आती तो मिसेज कोहली की असलियत कौन जानता ?“
“मैं यह दूसरी चिठ्ठी जो इसके साथ रख रही हूं, उसकी कार्बन काॅपी मैंने मिस ऊषा को पोस्ट की है और यह पहली प्रति आपके पास सबूत के तौर पर रहेगी। इसकी फोटोस्टेट आप अखबार को दीजिएगा, ताकि लोगों को पता चले कि एक स्टूडेंट के साथ क्या क्या होता है। दुनिया भी जाने एक छात्रा, जो गोल्ड मेडलिस्ट रही, आखिर वह क्या वजह थी, जिसने उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया। वह वजह थी मेरी एडवाइजर श्रीमती उमा कोहली की प्रताड़ना। उन्होंने मुझे आज धमकाया कि तुम यहां से तीन साल से पहले नहीं निकल पाओगी। मगर वह मुझे तीन दिन भी नहीं रोक सकतीं।“

“शी (श्रीमती कोहली) इज रिसपाॅन्सबिल फाॅर माई डेथ। “
“आप लोगों को यह बात बताना कि लोग अपने बच्चों को पढ़ने भेजें, तो देख लें कि कहीं उनका भविष्य किसी मिसेज कोहली जैसी चंडालिनी औरत के हाथों में तो नहीं है। मैनें एक पत्र वी. सी को लिखा है, जिसकी कार्बन काॅपी इसी के साथ रख रही हूं। बस अब अलविदा – रश्मि। आपकी बेटी निशी।“

इस पत्र से यह स्पष्ट हो गया कि रश्मि की आत्महत्या का कारण श्रीमती उमा कोहली द्वारा दी गई प्रताड़ना थी। मिस ऊषा को लिखा गया पत्र अंग्रेजी में था। पत्र के अनुसार, “प्यारी मैडम ऊषा, आप बहुत खुश होंगी और अपने विभाग की दूसरी लड़की की मौत की खबर मिलने पर जश्न मनाएंगी। पहली अनुभा थी और दूसरी मैं हूं। मैडम, मानसिक प्रताड़ना शारीरिक यातना से कई गुनी बदतर होती है। यह मैं थी, जिसने स्नातक शिक्षा में स्वर्ण पदक पाया था। एक बुद्धिमान और साथ ही साथ मूलतः ईमानदार लड़की थी, जिसे आपकी प्रिय श्रीमती कोहली ने सीमाओं से परे जाकर प्रताडि़त किया। साथ ही धोखेबाज, बेईमान और विज्ञान की डिग्री प्राप्त करने में अक्षम होने का आरोप लगाया।
मैं आपसे पूछती हूं कि आपने उस औरत को एक स्नातकोत्तर छात्रा की गाइड नियुक्त करने की हिम्मत कैसे की ? मात्र डाॅक्टरेट की डिग्री प्राप्त कर लेने वाला व्यक्ति गाइड होने के काबिल नहीं हो जाता। जरा प्रयास कीजिए और देखिए कि वह एक गाइड कैसे हो सकती हैं। एक ऐसी प्राध्यापिका, जो किसी तरह का फैसला स्वयं नहीं कर सकती हैं, वह एक स्नातकोत्तर छात्रा की शोध में गाइड कैसे हो सकती हैं ?

मैडम ऊषा, अगर आपकी याददाश्त थोड़ी भी अच्छी है, तो इस बात को याद कीजिए कि आपने मुझे स्पेशल प्राॅब्लम के लिए विषय दिया। इसमें भी आपने मेरी सहमति न लेकर केवल श्रीमती कोहली से ही विचार विमर्श किया था, ’मैं आठ दस हफ्ते तक सर्वेक्षण के लिए आठ दस परिवारों को चुन लूं।’ मैनें ऐसा ही किया। शोध के दौरान जब कभी मुझे किसी समस्या का सामना करना पड़ता था, तो मैं उनके पास जाती थी। आप जानती हैं, उनका जवाब क्या होता था ? वह हमेशा कहती थी, ’मैं इसे बाद में देख लूंगी।’ और वह ’बाद में ’ कभी नहीं आया।

जब उन्होंने मुझसे जनवरी 88 का सर्वेक्षण रोक देने को कहा, तो मैंने वैसा ही किया। अप्रैल में वह अपनी कही बातों को भूल गईं और आदेश दिया कि मैं सर्वेक्षण जारी रखूं।
मैंने उन्हें बताया, ’मेरे लिए यह बहुत मुश्किल होगा कि मैं दो माह के बाद उन्हीं परिवारों के पास जाकर वही सवाल करूं’, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी और अपनी जिद पर अड़ी रहीं। मैं उस नर्क में दुबारा नहीं जाना चाहती थी। उस समय मैं अपने शोध कार्य में व्यस्त थी।

इसके बाद उन्होंने मुझे बराबर बुरी तरह प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। आज उन्होंने मुझसे कहा, “रश्मि, तुम समझती हो कि तुमने अपनी थीसिस पूरी कर ली और तुम्हारा कार्य खत्म हो गया। मैं तुमसे फिर से थीसिस लिखवाऊंगी। तुम यहां से तीन वर्ष से पहले डिग्री लेकर नहीं जा सकती।“

मैं ऐसी डिग्री नहीं लेना चाहती जो एक इंसान को हजारों टुकड़ों में बिखेर कर रख दे। अगर आपके अंदर जरा सी भी इंसानियत बची हो, तो एक लम्हे के लिए मेरे दर्द का अहसास करें मेरे उस तनाव का अहसास करें, जब आपने मुझे धोखेबाज कहा, जबकि, मैं धोखेबाज नहीं हूं। लेकिन श्रीमती कोहली धोखेबाज और कुटनी हैं। एक अध्यापक के कर्तव्य को वह जानती तक नहीं।“

इस पत्र के अंत में तीन बार रश्मि लिखा था। इन पत्रों से उजागर हुए तथ्यों से छात्र उत्तेजित हो उठे। 29 जुलाई की देर रात कुलपति ने पंतनगर छात्र संगठन से एक समझौता कर लिया, जिसमें श्रीमती कोहली को निलम्बित करने और मिस ऊषा तथा एस. के. शर्मा को लंबी छुट्टी पर भेजने का निर्णय था।

6 अगस्त को छात्रों को संबोधित करते हुए डाॅ. महातिम सिंह ने अपने दोनों निर्णय ज्यों के त्यों सुना दिये। साथ ही छात्रों और अध्यापकों की एक संयुक्त जांच समिति बनाने की घोषणा भी की, ताकि यह पता चल सके कि कहीं विश्वविद्यालय की शिक्षा प्रणाली तो दोषपूर्ण नहीं, जिसके कारण छात्र आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं। इसी के साथ उन्होंने राज्य सरकार से रश्मि के मामले की जांच सीबीआई से कराने का आग्रह किया।
रश्मि के पिता गोपालशरण अग्रवाल ने कहा “रश्मि गेहूं में लगने वाले एक रोग और गरीबों में उसे खाने से होने वाले कुपोषण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर शोध कर रही थी। मैं चाहता था कि मेरी बेटी देश की सेवा करे, पर उसे मरने के लिए मजबूर कर दिया गया। मैंने प्रधानमंत्री को भी एक पत्र लिख कर मांग की है कि भविष्य में ऐसी प्रतिभाओं को मरने से बचाने के लिए पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में गहरी जांच पड़ताल की जरूरत है। मैं चाहता हूं, रश्मि की अंतिम इच्छा अवश्य पूरी हो कि उसे न्याय मिले। “
                                                       निशीथ जोशी ।


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