जब वैवाहिक जीवन में एक पड़ाव के बाद आपके पत्नी का आपसे सेक्स करने का रूचि ख़तम सा हो जाता है

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हमारे पड़ोसी मिस्टर संधीर सक्सेना एक चालीस वर्षीय खुशमिजाज व्यक्ति हैं। उनकी श्रीमतीजी की आयु करीब 35.36 के आसपास है। घर में दो छोटे बच्चे हैं। छोटा सा सुखी परिवार है। एक दिन सुधीर ने अपनी पत्नी सुधा से कहा की ऑॅफिस से पन्द्रह दिनों की छुट्टी मिली है। क्यों न हम मसूरी नैनीताल आदि घूम आएं। बच्चों को उनके नाना के पास छोड़ देंगे।
सुधीर के प्रस्ताव में आपत्तिजनक कुछ भी न था। दरअसल वह शरीरिक और मानसिक तनाव से मुक्त होकर अपने विवाह के आरंभिक दिनों की यादें ताजा करना चाहता था। पर सुधा बिफर पड़ी तुम्हे तो इस बुढ़ापे में जवानी की रंगीनियां सूझ रही हैं। जरा सोचोए क्या यह उम्र हमारे घूमने फिरने और मजे करने की है लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे सुधीर बुझकर रह गया।
वस्तुतः यह मानसिकता केवल सुधा की नहीं बल्कि उन अधिकांश भारतीय स्त्रियों की है जो 30 . 35 वर्ष की उम्र तक आते आते और एक दो बच्चे पैदा हो जाने के बाद अपने दाम्पत्य सुखों की बेला को समाप्त मान चुकी होती हैं। अब उनके लिए जिंदगी का मकसद केवल अपने बच्चों की परवरिश करना और अन्य सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करना भर रह जाता है। इस भ्रम जाल में उनका पूरा वैवाहिक जीवन व यौन पक्ष पूरी तरह ही उपेक्षित होकर रह जाता है। सौन्दर्य स्वास्थ्य आदि के प्रति लापरवाही से इस उम्र में महिलाओं का दैहिक आकर्षण घटने लगता है। उस पर मनसिक रूप से भी दाम्पत्य दायित्वों के प्रति उपेक्षा का भाव पति के मन में कई कुंठाएं उत्पन्न कर देता है। कई बार उसके कदम दूसरी दिशाओं की ओर मुड़ने लगते हैं।
जब हम इंग्लैण्ड रूस अमेरिका आदि पाश्चात्य देशों में औरत की स्थिति पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि वहां महिलाओं का वास्तविक जीवन ही तीस वर्ष की आयु के पश्चात शुरू होता है तथा वे लंबे समय तक बिना किसी अपराध बोध या हीन भावना के वैवाहिक सुखों का उपयोग करती है।
यह सही है कि पश्चिमी देशों की संस्कृति जीवन शैली तथा मूल्यों और हमारी सामाजिक संरचना में आधारभूत अंतर है किन्तु जहां तक ढलती उम्र में दाम्पत्य संबंधों के निर्वहन का सवाल है सचमुच पाश्चात्य जगत हमारे समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करता है। विवाह विच्छेद तलाक आदि समस्याओं के बावजूद पश्चिमी देशों की महिलाएं उम्र के ढलान के आखिरी मोड़ तक सहज रूप से जीवन का आनंद लेती हैं।
जब हम भारतीय परिवेश में ढलती उम्र में वैवाहिक संबंधों पर विचार करते हैं तो पाते है कि अधिकांश व्यक्ति बेमन से इन संबंधों का बोझ ढोते नजर आते हैं। पति पत्नी स्वयं को एक दूसरे के प्रति मोहभंग की स्थिति में पाते हैं। क्या सचमुच दाम्पत्य संबंधों का यही अंतिम सत्य है।
दरअसल फर्क जीवन दृष्टि का है। प्रारंभ में विवाह को लेकर अधिकांश व्यक्ति यह खुशफहमी पाले बेठे होते हैं कि विवाह ही सभी सुखों का स्रोत है और विवाह होते ही वह सुखमय जीवन की ओर अग्रसर हो जाएंगे। युवतियों में अपनी संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता के कारण यह भावना काफी गहराई तक पैठ कर चुकी होती है। विवाह के बाद कुछ अर्से तक यह खुशफहमियां बनी रहती हैं बल्कि और मजबूत हो जाती हैं। पर विवाह के बाद प्रेम मादकता और अंतरंगता से भरा यह अर्सा काफी छोटा होता है। जब महकी हुई मधुर मादकता का यह नशा टूटता है और स्वप्नलोक में विचरण करने के बाद जब पांव यर्थाथ की ठोस और सख्त जमीन पर पड़ते हैं तो आदमी खुद को अनेक समस्याओं और संबंधों से घिरा पाता है। विवाह एक मधुर बंधन है लेकिन समय के अंतराल से जब इस बंधंन का कसाव कुछ ढीला पड़ने लगता है तो अचानक समूचे वैवाहिक जीवन के आईने में दरारें उभर आती हैं हालंकि हमारे सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों की फ्रेम इन दरारों के बावजूद वैवाहिक जीवन को बिखरने से रोके रखती है किन्तु तब जीवन में रिश्तों के माधुर्य का रस स्रोत सूख जाता है।
बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति के दायित्व भी बढ़ने लगते हैं। बच्चों की परवरिश घर का खर्च पढ़ाई लिखाई कपडे़ लत्ते शादी विवाह सामाजिक बंधंनों का निर्वहन आदि सैकड़ों छोटेे बड़े विषयों में आदमी इस प्रकार उलझ जाता है कि उसका वैवाहिक जीवन उपेक्षित होकर रह जाता है। बहुआयामी जिम्मेदारियां और अर्थसंकट उसे व्यथित किए रहते हैं। पति पत्नी न तो एक दूसरे के लिए समय निकाल पाते हैं और न ही अपने दायित्वों का भली प्रकार निर्वहन कर पाते हैं।
यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि पति पत्नी दोनों को एक दूसरे की जरूरत जवानी के दिनों की अपेक्षा क्रमशः प्रौढ़ावस्था व वृद्धावस्था में कहीं अधिक होती है। यह हमारी सामाजिक व्यवस्था की विडम्बना ही है कि आदमी को सबसे अधिक उत्तरदायित्वों का बोझ चालीस पैंतालीस वर्ष की आयु में उठाना पड़ता है। मकान का सपना बड़े होते बच्चों की महंगी शिक्षा विवाह योग्य बच्चों के विवाह की चिंता आदि दायित्वों को पूरा करने के लिए व्यक्ति रात दिन जूझता है। यह समस्या उसके लिए तनाव पैदा करती है। तब आदमी को लगता है कि काश कोई तो हो जिससे वह अपने मन की बात कह सके जो उसे ढांढ़स बंधाए लेकिन पत्नी की उदासीनता और उपेक्षित व्यवहार से उसके अहं को आघात लगता है। यहीं दाम्पत्य संबंधों के कुंठित हो जाने की शुरूआत होती है।
सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिए दोनों पक्षों में आपसी विश्वास और समझ बूझ का सामंजस्य बना रहना जरूरी होता है। उम्र बढ़ने के साथ . साथ परस्पर अंतरंगता क्रमशः बढ़नी चाहिए।
पति पत्नी दोनों को एक दूसरे की भावनाओं व रूचियों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर ही वे एक दूसरे को अधिक गहराई से समझ पाने में सक्षम हो पाते हैं। अतः मानसिक स्तर पर परस्पर आत्मिय जुड़ाव दाम्पत्य संबंधों की सरसता को बनाए रखने के लिए सहायक सिद्ध होता है।
प्रायः देखा गया है इस आयु में विवाहित जीवन का यौन पक्ष बुरी तरह से उपेक्षित हो जाता है। इसके लिए अधिक जिम्मेदारी प्रायः महिलाओं की होती है। उनके लिए सेक्स महज युवावस्था के आनंद की वस्तु होती है तथा इस उम्र में वे मानसिक तौर पर प्रायः तय कर चुकी होती हैं कि उन्होंने पारी खेल ली है। यह मानसिकता महिलाओं को अपने रहन सहन बनाव सिंगार और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह बना देती है। उनकी अपने सौंदर्य के प्रति यह उदासीनता पति को असह्य लगती है क्योंकि प्रौढ़ावस्था में आकर पुरूष का सौंदर्यबोध और अधिक परिपक्व हो जाता है। वस्तुतः स्वस्थ्य यौन संबंध वैवाहिक जीवन की रीढ़ होते हैं। यदि दाम्पत्य जीवन का यौन पक्ष संतुलित हुआ तो कई समस्याएं खुद बखुद हल हो जाती हैं। अतः महिलाओं को चाहिए कि वे खुद के सौंदर्य और स्वास्थ्य के प्रति सचेतन व जागरूक रहें। संतुलित खानपान तथा नियमित व्यायाम द्वारा यौवन व सौंदर्य को बरकरार रखा जा सकता है।
अपनी जिम्मेदारियों व अन्य संबंधों के निर्वाह का बहाना लेकर पति या पत्नी के लिए एक .दूसरे की उपेक्षा करना दाम्पत्य संबंधों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। जीवन संघर्षों के दौर में जब दोनों एक दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे तो संघर्षों पर तो विजय पा ही लेंगेए साथ ही उनके बीच मौजूद आत्मीय सरसता का बंधंन भी और मजबूत हो जाएगा। याद रखिए पति का मौजूद होना ही पत्नी के लिए समूचा सुरक्षा कवच है। पति के कारण ही पत्नी को समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। इसके बदले यदि पतिए पत्नी से प्यार सहानुभूति और अंतरंगता चाहता है तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं है।
जब जवानी के रूपहले दिनों में आपस में सुख दुख बांटने और हर राह पर साथ चलने के वादे किए थे तो आज उम्र के इस मोड़ पर आकर यह हिचकिचाहट और असमंजस क्यों घ् क्रमशः बढ़ती उम्र में पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति से बेहतर साथी व दोस्त कोई अन्य नहीं हो सकता। यह रिश्ता कहीं से भी बनावटी नहीं है। यह एक प्राकृतिक आवश्यकता पर आधारित संबंध है। जब हम दुनियाभर के सारे रिश्तों संबंधों को निभा सकते हैं तो इस सहज प्राकृतिक संबंध के प्रति उपेक्षा न तो उचित है और न न्याय संगत।
कैलाश जैन


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