पत्नी की सेक्स इच्छा को भी समझें

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विवाह स्त्री पुरूष को दाम्पत्य जीवन की डोर से बांधता है। इससे स्त्री पुरूष को न केवल साथ रहने की सामाजिक स्वीकृति व सुविधा मिलती है, अपितु पति व पत्नी दोनों का ही एक दूसरे की सभी प्रकार की निजी उपलब्धियों पर आपसी दावा भी प्राप्त होता है और एक दूसरे पर पूरा भरोसा, स्नेह और निर्भरता का संबंध घनिष्ठ होता है। विवाह द्वारा दामपत्य जीवन में सामाजिक रूप से जो सबसे बड़ी स्वतंत्रता प्राप्त होती है, वह यह कि काम भावनाओं का बिना रोक टोक के इजहार और कामेच्छाओं की पूर्ति स्वतंत्र रूप से की जा सकती है। इसलिए इस क्रिया को सहवास या सम्भोग का नाम दिया गया है, क्योंकि इसमें पति पत्नी दोनों की रजामन्दी से, सही रूप से अपने स्नेह से परिपूर्ण एक दूसरे के प्रति भावनाओं का प्रदर्शन किया जाता है।पर अफसोस तब होता है जब कभी कभी या अक्सर किन्हीं पति पत्नी में सही तौर पर आपसी ताल मेल नहीं होता। इस कारण पति केवल अपनी ही वासना की पूर्ति के लिए और अपनी उत्तेजना को शान्त करने के लिए अपनी पत्नी को एक जरिया समझता है और पत्नी बेमन से उसकी वासना पूर्ति के लिए अपने अपको समर्पित कर देती है। हमारे समाज में स्त्रियां अक्सर अपनी भावनाओं को ठीक से न समझ पाती हैं न इस बारे में कह पाती हैं और न ही अपने दाम्पत्य जीवन में इसको अपना अधिकार मानती हैं। पश्चिमी देशों में स्त्रियां अपनी काम-वासनाओं की पूर्ति को भी अपना पूर्ण अधिकार मानती हैं, क्योंकि वह जानती हैं कि यह हक केवल पुरूष का ही नहीं है, वह भी उतनी ही दावेदार और हकदार है। वहां उनकी इच्छाओं के अनुसार आपसी रजामंदी से ही पति उनसे सेक्स संबंध स्थापित कर सकता है।               

समाज में स्त्री पुरूष संबंध का महत्वहर समाज में भिन्न भिन्न संस्कृति के अनुसार पति पत्नी के नाते में काम क्रिया के लिए अपना स्थान दिया हुआ है। जैसा कि कुछ आदिवासी जातियों में काम वासना की पूर्ति के लिए पत्नी का स्थान ऊंचा माना गया है और पति को उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हर खिलवाड़ को करना पड़ता है, ताकि वह प्रसन्न रहे। उसकी कामेच्छा को पूरा करने के लिए पति को उसकी इच्छानुरूप गतिविधियों का प्रयोग करना पड़ता है और सम्भोग दोनों की इच्छा के मुताबिक होता है। पर आमतौर पर पुरूष प्रधान समाज में स्त्री का दर्जा नीचा होने के कारण पत्नी की कामेच्छा को नजरअंदाज किया जाता है। उसकी शारीरिक तथा मानसिक मजबूरियों को भी पति ध्यान में नहीं रखते और जैसा कि आम रोजमर्रा की जिंदगी में स्त्री के कोई विशेष अधिकार नहीं समझे जाते, उसी तरह स्त्री को भोग विलास के सभी साधनों में एक आवश्यक साधन मात्र, माना जाता है। काम संबंध में भी बहुत ऊंच नीच होता है, जिससे प्रायः मन मुटाव हो जाता है। अक्सर पति, पत्नी की कामेच्छाओं के बारे में पूर्णतया जानकारी नहीं रखते। पति होने के नाते उन्हें अपनी ही वासना की पूर्ति करने का एकमात्र साधन समझकर अपनी मनमानी करते हैं।पुरूष स्त्री के मानसिक विकास एवं उसकी काम भावनाओं और इच्छाओं के बारे में जानकारी नहीं रखते और न ही ठीक से समझ पाते हैं की काम क्रिया में सही प्रकार से सहवास व आनंद प्राप्त करने में पत्नी का सहयोग कितना आवश्यक है। इसी वजह से वह उसका जब जी चाहे जैसे चाहे प्रयोग करता है। इस एकतरफा काम क्रिया में प्रायः पति अपनी वासना की पूर्ति करने के पश्चात पत्नी को भी असंतुष्ट ही छोड़ देते हैं। इस तरह की काम क्रिया को भी गलत समझा और कहा जाता है। यह भी एक प्रकार का बलात्कार ही माना जाता है।                       

स्त्री और उसकी कामेच्छायेंपत्नी अक्सर अपने पति में प्रेमी का रूप देखती है और उसकी काम भावनाओं को तभी उकसाया जा सकता है जब उसे स्नेह स्थित भावनाओं से सहलाया जाए और उसे प्रेमिका का रूप दिया जाए। पति विवाह के पश्चात कब तक अपने आपको अपनी पत्नी का प्रेमी समझ सकता है और ऐसी नरम भावनाओं को दर्शा सकता है, यह तो परिस्थितियों और अपने अपने व्यक्तित्व पर निर्भर करता है, परंतु पत्नी की हमेशा यही इच्छा रहती है, कि उसका पति उसे उसी अंदाज से देखे और सहलाए जैसे कि शादी के पश्चात व्यवहार था। जब पत्नी अपने पति में प्रेम भावनाओं का अभाव पाती है और उसे यह महसूस होता है कि पति केवल अपनी कामवासना की पूर्ति करने के लिए उसके साथ सोता और भोग करता है, तो उसकी अपनी कामेच्छायें भी धीरे धीरे घटती सी प्रतीत होती हैं। पत्नी की ऐसी मनःस्थिति में जिसमें वह अपनी इच्छाओं के विरूद्ध अपने शरीर को समर्पण करती है, उससे काम संबंध रखना उसके साथ बलात्कार ही है मगर आम भारतीय दम्पती में अभी पति पत्नी के संबंधों में ऐसी समझ अथवा नासमझी नहीं आने पायी है। 

डा. प्रेमा बाली। 


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