सुहाग का प्रतीक सिन्दूर

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सिन्दूर शब्द से एक पवित्र लाल रंग की आभा आंखों के सामने उभर आती है, जो सगुन का प्रतीक है। यही सिन्दूर विवाहित नारी के माथे पर सजकर सुहाग का चिन्ह बन जाता है।
सिन्दूर के व्यवहार की शुरूआत को जानने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास के पृष्ठों में झांकना होगा।

कहा जाता है कि भारत वर्ष में आर्यों के आगमन के पहले अनार्य लोग रहा करते थे। भारत में आने के बाद आर्य व अनार्य सभ्यताओं का पारस्परिक मेल मिलाप होता रहा। आर्य लोगों ने अनार्यों से सिन्दूर लगाना, नारियल खाना, शंख के कंगन पहनना आदि सीख लिया। इसी तरह धीरे धीरे सिन्दूर हिंदू धर्म के रीति रिवाज का आवश्यक अंग बन गया।

नवजात शिशु के जन्म के बाद से ही सिन्दूर का प्रयोग शुरू हो जाता है। संतान के जन्म के बाद षष्ठी पूजा के दिन भगवान के आशीर्वाद के रूप में नवजात के माथे पर सिन्दूर लगाया जाता है। विवाह के समय नई दुल्हन की मांग लाल सिन्दूर से भरी जाती है। नववधू जब सिन्दूर से मांग भरकर नए गहनों से सजी होती है तो उसके रूप में चार चांद लग जाते हैं। लाल बार्डर की साड़ी में सिन्दूर भरी मांग और माथे पर लाल बिंदी लगी किसी नारी को देखते ही उस मातृमूर्ति के प्रति अनायास ही मां संबोधन निकल जाता है।

जीवन के अंतिम दिनों तक इस सिन्दूर का व्यवहार निरंतर होता रहता है। हर एक विवाहित नारी को अपने अपने बुज़ुर्गों  से चिर सुहागिन होने का आशीर्वाद मिलता है और सिन्दूर भरी मांग लेकर अपने पति से पहले इस दुनिया से विदा होने की कामना हर नारी के मन में रहती है।
इसके अलावा सिन्दूर शौर्य और वीरता का भी प्रतीक है। हर शुभ अनुष्ठान पर माथे पर चंदन, रोली या सिन्दूर का टीका लगाना शुभ माना जाता है।
हिन्दुओं के सभी अनुष्ठानों का आवश्यक अंग है सिन्दूर।  इदम् सिन्दूरम् श्री दक्षिणा कालिकायै देवतायै नमः इसी मंत्र के उच्चारण के साथ मां काली को सिन्दूर लगाया जाता है।
दुर्गापूजा, कालीपूजा, जगदधात्री राम, सीता आदि देवी देवताओं की पूजा के बाद सुहागिनें एक दूसरे को सिन्दूर लगाती हैं।
 दुर्गा पूजा में देवी के “बोधन” में सिन्दूर का प्रयोग होने के पश्चात केले के वृक्ष से बनी बहू ( जिसे गणेश जी के मूर्ति के पास रखा जाता है ) तथा अन्य देवी देवताओं को भी सिन्दूर लगाया जाता है। दुर्गा पूजा का अंतिम दिन, विसर्जन का दिन कहलाता है। उस दिन सुहागिनें एक दूसरे को सिन्दूर लगाकर देवी से सौभाग्य और आशीर्वाद मांगने के पश्चात पूजा अनुष्ठान का समापन करती हैं।
सिन्दूर की महिमा को देखते हुए हम लोग भी देवी से यही प्रार्थना करें कि सिन्दूर की लालिमा अशुभ का नाश करे और जीवन को सार्थक, सुन्दर  व मंगलमय बनाए।
                                                           ईश्वरी प्रसाद भट्टाचार्य


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