यह प्यार है या खुमार

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‘आंटी देखिए‘, पड़ोस की नन्ही किशोरी निकिता ने एक मुड़े- तुड़े कागज को मेरे सामने खोलकर रख दिया। किसी पत्रिका से फाड़ा हुआ पन्ना था वह,और पूरे कवर पर छाए हुए थे ‘तृष्णा‘ टी वी सीरियल के हीरो तरूण धनराजगीर। मफतलाल के कपड़ों का विज्ञापन था वह और अपनी दिलफरेब सूरत लिए तरूण कई पोजेज में वहां मौजूद थे।
‘वाह‘ मैनें दाद दी, और निक्की के सुकुमार चेहरे और उसकी बड़ी – बड़ी डोनल्ड डक नुमा आंखों में खुशी नाच उठी।
आजकल निकिता का लेटेस्ट क्रेज तरूण है, यों दो महीने पहले वह विनोद खन्ना पर फिदा थी। निकिता तो महज बारह — तेरह साल की भोली किशोरी है लेकिन 18 की मिंकू, 20 की नीला और 25 से 30 के बीच की न जाने कितनी हीं रूपालियां, सोनलें और सारिकाएं, टीवी स्क्रीन पर राजीव गांधी के सुदर्शन चेहरे पर आखें टिकाये बैठी रहती हैं। उनका दिल जैसे उनकी आंखों में उतर आता है और इसमें कोई शक नहीं कि किशोरी से लेकर दो बच्चों वाली प्रौढ़ा मिसेज मेहरा या मिसेज सप्रू भी ‘बच्चन‘ जी के चित्रहार में अवतरित होते ही, कुर्सी पर सीधी होकर बैठ जाती हैं।
यह सब क्या है ? क्या यह प्यार है या महज एक खुमार या एक नशा या एक मोह ?
सच तो यह है कि यह प्यार नहीं है। शब्दकोष इसे प्रेमांधता कहता है और अंग्रेजी में इसे कहते हैं इन्फैचुरेशन। विपरीत सेक्स के प्रति गहरे आकर्षण का नाम ही प्रेम, प्यार या लव है, इसे वास्तविक और स्थायी कहा जाता है, जबकि इसके विपरीत ऊपर वर्णित उन्माद को कृत्रिम, अस्थायी और मूर्खतापूर्ण मना जाता है। पर मुश्किल तो यह है शुरूआत की अवस्था में क्या प्रेम और क्या प्रेमांधता, दोनों का ही रूप एक सा लगता है यानि वही तड़प, वही मिलन और सामीप्य कामना, प्रिय के दर्शनों की ललक। चाहे सच्चा प्यार हो या इन्फैचुरेशन शुरू में भावनाएं ही जोर मारती हैं और बुद्धि ताक पर रख दी जाती है। अब सवाल यह भी है कि सच्चे प्यार और झूठे खुमार में भेद कैसे किया जाए ?
गुणीजन कहते हैं कि जिसको करीब से जाना जा सके और, जिससे उन्माद की हद तक लगाव हो जाए वही प्यार है, लेकिन जो आपके लिए आकाश कुसुम है उसके प्रति गहरा खिंचाव प्रेमान्धता है। इस बात को भी स्वीकारना कि हम सब जवानी के दिनों में पहले इसी प्रेमान्धता से ग्रस्त होते हैं, फिर कहीं सच्चे प्यार का स्वाद चख पाते हैं।
अज्ञेय जी के ‘शेखर‘, भारती जी के ‘चंदर‘, शरतचन्द्र के ‘श्रीकांत‘ से न जाने कितनी युवतियां प्रेम कर बैठती हैं। कौन हैं ये ? केवल प्रसिद्ध उपन्यासों के नायक। एक जमाने में कवि नीरज, डाॅ कैलाश वाजपेई या राजनारायण बिसारिया जैसे प्रियदर्शन व्यक्तित्व वाले कवियों के प्रति कितनी ही युवतियां अनुरक्त हो उठी थीं। आवाज और अंदाज के धनी अमीन सयानी भी हममें से कितनों के ‘ड्रीम बाॅय‘ रह चुके होंगे। फिल्मस्टार हों या क्रिकेटर, गायक हों या राजनेता, सभी प्रेम देवता बन बैठते हैं और इसमें कोई शर्म की बात भी नहीं, यह एक नैसर्गिक भावनात्मक ज्वार है। समय और अनुभव ही इस ज्वार को नियंत्रित करते हैं। पर खुमार या प्रेमांधता को एकदम निचले स्तर पर आंकना भी न्यायोचित न होगा, क्योंकि हरेक के मामले में चाहे जो भी हो, लेकिन कभी – कभी यही प्रेमांधता परिपक्व होकर प्यार का रूप ले लेती है और अन्ततः यही प्यार प्रेमी – प्रेमिका के मिलन यानि विवाह में परिणित हो जाता है। इस अवस्था में प्यार की गंगोत्री है वही प्रेमांधता या इन्फैचुरेशन जिसे हम प्यार के मुकाबले निकृष्ट मान बैठते हैं।
सच्चा प्यार लेकिन लेबिल प्रेमांधता का –
जो लोग प्यार को न कभी समझ पाते हैं न प्यार कर पाते है, वे प्यार और खुमार दोनों को ही वासना कहते हैं। प्रेमी और प्रेमांध दोनों ही को वे हेय दृष्टि से देखते हैं।
दुर्भाग्य तो यह है कि आमतौर पर प्यार करने वालों से समाज खफा रहता है। मां – बाप, सगे – संबंधी और जन साधारण प्रेमी – प्रेमिका के दुःसाहस को आसानी से पचा नहीं पाते और उनके प्यार को प्रेमांधता का नाम देते हैं।
यदि कोई विवाहित स्त्री – पुरूष एक दूसरे को गहराई से प्यार कर बैठते हैं तो वह भी प्रेमांधता है। प्रायः जब दो विभिन्न तबकों के प्रेमी – प्रेमिका एक दूसरे को दिलोजान से चाहने लगते हैं तो भी वे प्यार के बै्रकेट में नहीं आते। उन्हें प्रेमांध ही कहा जाता है।
प्यार हो या मोह, स्वप्न दोनों में ही बुने जाने हैं, जब तक अपने प्रिय से मिलन नहीं होता, तब तक कल्पना के सहारे ही जीने का प्रयत्न होता है।
यदि आपका प्यार समय की सीमाओं को लांघकर भी अडिग है, गहरा है, यदि प्रिय से आपका मिलन हो जाए या मिलन  न हो सकने पर भी आप आजीवन उसी के आकर्षण में आकंठ डूबी रहें, तो यही प्यार है।
लेकिन जब आप केवल शारीरिक आकर्षण से बंधी किसी ऐसे व्यक्ति से प्यार कर बैठें जो बदले में आपको प्यार न दे सके। जब आप हर छह माह के बाद किसी नए प्रेमी पर फिदा हो जाएं, जब आप चैबिस घंटे के बजाय केवल फुर्सत के क्षणों में ही अपने प्रेम देवता को याद करें तो समझिए कि यह प्रेमांधता है। प्यार एक भूख है, एक जरूरत है, बदन में दौड़ते खून या चलती सांसों की तरह एक वास्तविकता है, लेकिन इन्फैचुरेशन , खुमार या प्रेमांधता को सच्चा प्यार समझने की भूल न करें। आप काॅलेज की छात्रा हों या आत्मविश्वासी कामकाजी युवती दिल के हाथों बिक जाने से पहले अपने दिमाग से राय लीजिए कि –            
‘सुलग रहा है जो लावे की मानिंद
ये प्यार है या खुमार है ?‘

                                                      मनोरमा प्रतिनिधि द्वारा


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