तलाश है एक कमाऊ पत्नी की

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“28 वर्षीय स्वस्थ, सुन्दर एवं स्मार्ट युवक के लिए घरेलू, सुन्दर, सुशिक्षित वधु चाहिए। नौकरीपेशा कन्या को वरीयता।“ “36 वर्षीय, केंद्रीय सेवारत विघुर, दो पुत्र 5 वर्ष व 7 वर्ष हेतु गृह कार्य में दक्ष, सुयोग्य कामकाजी वधु चाहिए। कोई जाति बंधन नहीं।““उम्र 40 वर्ष राजपत्रित अधिकारी के लिए आवश्यकता है एक कार्यरत जीवनसाथी की। विधवा एवं तलाकशुदा भी स्वीकार्य।“वैवाहिक विज्ञापनों पर एक दृष्टि डालिए तो इस प्रकार के न जानें कितने विज्ञापन पाएंगे। कन्या चाहे कितनी भी गुण सम्पन्न हो, लेकिन वह नौकरीशुदा अवश्य हो।उपभीेक्ता संस्कृति की गगनचुम्बी आकांक्षाओं और बढ़ती महंगाई ने वर पक्ष के लोगों के दृष्टिकोण में एक जादुई परिवर्तन कर दिया है कि घर में बहू लाने की पहली शर्त कमाऊ लड़की।कुछ वर्षों पहले ही जिस समाज में पत्नी का नौकरी करना पति के पौरूष पर चोट माना जाता था वहीं अब सुन्दर, सुघढ़ और कमाऊ वधु को घर लाना गर्व की बात मानी जाने लगी है। पति व ससुरालवालों के इस बदलते नजरिये ने नारी को घर की जंजीरों से मुक्त तो अवश्य कर दिया है, लेकिन अक्सर यह मुक्ति उसे बहुत महंगी पड़ती है। घर, दफ्तर, पति, परिवार की अपेक्षाएं पूरी करते करते इस तथाकथित ’मुक्ति’ पाने के लिए वह तड़प जाती है। ऐसी स्थिति में उसके भीतर उबलता आक्रोश घर की शांति को छिन्न भिन्न करके रख देता है और परिवार विघटन के कगार पर आ खड़ा होता है। पति पत्नी दोनों धनोपार्जन में लगे हों तो घर सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होना चाहिए, लेकिन कभी कभी पति व ससुरालवालों की नासमझी के कारण सुख की सारी संभावनाएं रोज की चिक चिक और अनेकों तनावों से घिर कर दम तोड़ देती है और बढ़ी हुई आमदनी की सार्थकता समाप्त हो जाती है। 

कैसे बनती हैं जटिल स्थितियां ?घर की बहू जब नौकरी करने निकलती है तो कैसी कैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं इस बात की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है और यदि जाता भी है तो उस समय हम उत्साह में आकर यह कहते हुए बात टाल देते हैं, “अरे, हम आपस में ऐसा सही तालमेल बैठाएंगे कि कोई दिक्कत न होगी।“ पर वास्तव में सही तालमेल की बात हम कितने दिन अपने दिमाग में रख पाते हैं। शुरू शुरू में तो घर की कार्यशील बहू का ख्याल रखा जाता है, लेकिन बाद में धीरे धीरे घर के लोग बहू के प्रति उदासीन हो जाते हैं और उससे अपेक्षा करते हैं कि वह आॅफिस में दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद, घर में भी आते ही घरेलू कामकाजों में जुट जाए। दोपहर में चूंकि सास व ननद ने खाना पकाया था इसलिए शाम की बारी बहू की है। दोनों पल्ला झाड़कर अलग हो लेती हैं। बहू के घर पहुंचते ही सासुजी पड़ोस में मिजाजपुर्सी के लिए निकल पड़ती हैं और ननद अपनी सहेलियों के साथ गप्पे लगाने में मशगूल हो जाती है। इतना ही नहीं अपने पतिदेव का भी रूख बदल जाता है, उनकी हमदर्दी धीरे धीरे समाप्त हो जाती है। खाने की टेबिल पर जब वो भोजन में मीनमेख निकालते हैं, तो सब्र का बांध टूट जाता है। मन करता है – बस कल ही से नौकरी वौकरी छोड़कर, चुपचाप घर में बैठ जाएं। ऐसी नौकरी से क्या लाभ जिसके कारण घर का अमन चैन खत्म हो और वह तमाम तनावों से घिरी हुई दोहरे दायित्व को संभाले।ऐसा समझा जाता है कि संयुक्त परिवार में रहने वाली कार्यशील बहुओं को काफी सुविधा रहती है। वह अपने घरेलू दायित्वों के प्रति निश्चिंत रहती हंै। परंतु ऐसा बहुत कम ही देखने में आता है।श्रीमती आभा का संयुक्त परिवार है। घर में सास ससुर, जेठ जेठानी, दो ननदें, देवर हैं। आभा जी ने इस कमरतोड़ महंगाई में अपने क्लर्क पति की आय कम देखते हुए निश्चय किया कि वह भी नौकरी करेंगी। घर के सभी लोगों ने खुशी खुशी हामी भर दी, सहयोग देने का वादा भी किया। लेकिन ज्यों ही आभा जी ने आॅफिस जाना शुरू किया कि घर के सभी लोगों ने अपना मुंह मोड़ लिया। जब तब यह सुनने को मिलता, “मेम साहब सुबह सुबह सजधज कर नौकरी करने के बहाने चल देती हैं तफरीह करने और हम इनके बच्चे संभालें, क्या नौकर हैं इनके ?“ श्री और श्रीमती खन्ना लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने की पक्षधर हैं, इसलिए पढ़ाई समाप्त होने पर उनकी बड़ी बेटी मंजुला ने दिल्ली जाकर नौकरी करने की इच्छा प्रकट की तो उन्होंने कोई आपत्ति न की। श्रीमती खन्ना का कहना था कि नौकरी करती लड़की के लिए आजकल वर खोजने में आसानी हो जाती है। दिल्ली में उनके माता पिता और भइया भाभी थे ही, इसलिए मंजुला को वहां रहने की भी कोई समस्या न थी। मंजुला की ट्रैवलिंग एजेंसी में नौकरी लग गई और एक साल के भीतर उसका विवाह भी हो गया। विवाह के शुरूआत के दिनों में सब कुछ खुशी खुशी बीतता गया, लेकिन जैसे ही मंजुला के एक बेटी हुई कि शुरू हुआ समस्याओं का सिलसिला। ऐसी आशंका उसे पहले से ही थी क्योंकि प्रसवकाल में ससुरालवालों से जिस हमदर्दी व स्नेह की अपेक्षा थी वह उसे न मिला था। फिर भी उसने अपना मनोबल बनाए रखा। सुबह नौ बजे तक किसी तरह घर का कामकाज निपटाकर और बच्ची को नहला धुलाकर भीड़ भाड़ वाली बस में धक्कम धुक्का खाने के बाद वह दफ्तर पहुंचती। आॅफिस में जी तोड़ काम करके शाम को फिर उसी तरह बस में धक्का खाने के बाद थकी मांदी घर पहुंचती। तो सासु जी यह कहते हुए बिटिया को उसे थमा देती, “ले अब संभाल अपनी बिटिया को, इस उम्र में अब यह सब झमेले नहीं संभलते, क्या जिंदगी भर यही सब करती रहूंगी।“ कुछ दिन तक तो वह किसी तरह बच्ची को संभालती रही लेकिन एक दिन उन्होंने साफ साफ मंजुला से कह दिया, “बहू, मेरी आराम करने की उम्र है, बच्चे संभालने की नहीं, अब तेरी बच्ची को संभालना मेरे बूते का काम नहीं।“ न चाहते हुए भी मंजुला को अपनी छह माह की बिटिया को मायके अपनी मां के पास मेरठ छोड़ आना पड़ा। भला एक मां अपनी इतनी नन्ही बच्ची से अलग होना कितने दिन सहती। मां की ममता छटपटा उठी। आखिर बेटी को अलग कर नौकरी करना मंजुला की अन्तरात्मा को मंजूर न हुआ पति ने लाए समझाया, “कुछ ही दिनों की तो बात है किसी तरह निभा लो। बच्ची के बड़े होते ही सब ठीकठाक हो जाएगा।“ पर मंजुला न मानी, बोली, “मैं कोई पैसा कमाने वाली मशीन नहीं हूं मैं एक मां भी हूं। अपनी बच्ची के लालन पालन के साथ खिलवाड़ करते हुए नौकरी करने का औचित्य मुझे समझ में नहीं आता ?“ अंततः मंजुला ने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।अपने पड़़ोस में रहने वाली रंजना को देखकर भी मन खीझ उठता है। रंजना रोज सुबह आॅफिस जाने से पहले अपनी बेटी को मां के पास आकर छोड़ जाती है और शाम को आॅफिस से लौटते समय बेटी को मां के पास लेने आती है। दिन भर बच्ची की देख रेख उसकी नानीजी ही करती हैं। रंजना की सरकारी नौकरी है, शादी से पहले से कर रही है। ससुराल वाले भी चाहते हैं कि वह नौकरी करती रहे, परंतु जिस सहयोग कि उसे आवश्यकता है उससे वह एकदम वंचित है। सास ने उसकी बच्ची की देखभाल शुरू में तो की, लेकिन बाद में उनकी हिम्मत डोल गई। रंजना ने जब बच्ची की देखभाल के लिए घर में एक आया रखनी चाही तो उससे भी घर में क्लेश उत्पन्न हुआ। सास का कहना था, “बहू के आया रखने से मेरी बदनामी होगी कि मैं बच्ची की देखरेख से जी चुराती हूं, लोग मुझे क्या कहेंगी ? कैसी दादीमां हूं मैं कि अपनी पोती की देखभाल नहीं कर सकती। अरे, बुढ़ापे में जितनी ताकत होगी उतना ही तो काम संभाल पाऊंगी।“ रंजना स्वीकारती है, “इस बुढ़ापे में दिन भर बच्ची की देखभाल सासुजी को थका डालती है, इसलिए वह झुंझला उठती हैं। ऐसे में मुझे मजबूरन मायके का आश्रय लेना पड़ा। मेरी मां तो कुछ नहीं कहतीं, लेकिन छोटे भाई की पत्नी गीता की भौं मुझे देखते ही अवश्य सिकुड़ जाती है। उसके भी एक छोटा बच्चा है। दोपहर में कामकाज के समय उस बच्चे को मां के संभालने से गीता को जरा सुविधा हो जाती थी। लेकिन मेरी बच्ची के होने के कारण मां गीता के बेटे को नहीं देख पाती हैं, इससे उसे परेशानी तो होती ही है।श्रीमती पाल एम टेक हैं। विवाह के पहले से ही नौकरी करती थीं। पर ससुराल में अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण ऊंचे ओहदे और खासी मोटी रकम वाली नौकरी को उन्होंने तिलांजलि दे दी। पहले तो सास उनके पास ही रहती थीं, परंतु अब वह दूसरी बहुओं के पास रहना अधिक पसंद करती हैं, क्योंकि वहां किसी प्रकार की जिम्मेदारी उन पर नहीं रहती है। वहां उनको बच्चों के साथ दिन भर बंधकर नहीं रहना पड़ता। घर की दूसरी बहुओं को भी नहीं सुहाता कि श्रीमती पाल नौकरी करके उनसे श्रेष्ठ कहलाएं, इसलिए ईष्र्यावश वो सास के कान भरती हैं – ’क्या आप की उम्र इतना बोझ उठाने की है ? हम बहुओं के होते हुए भी आपको बुढ़ापे में सुख चैन न मिले तो हमारे लिए शर्म की बात है।’ श्रीमती पाल के घर में जब बच्चों की देखभाल करने वाली कोई न रहा, तो हारकर उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। उनसे अपना इतना पढ़ा लिखा बेकार होते देखा न गया। अब वह समय मिलने पर घर पर ही उच्च कक्षाओं की गणित की ट्यूशन पढ़ाकर अपने को झूठी तसल्ली देती हैं।अपनी कमाऊ बहू द्वारा अर्जित धन तो ससुरालवालों को अच्छा लगता है, परंतु उसकी परेशानियों को बांटने के लिए कोई तैयार नहीं होता। घर से बाहर निकलने पर कामकाज संबंधी भी कई समस्याएं होती हैं, वहां भी उसे अपना मानसिक संतुलन बनाए रखना पड़ता है – आखिर वह अपना दुख बांटे तो किससे ? ले देकर एक पति की ओर से ही उसे अपनेपन व हमदर्दी की आशा होती है। परंतु वह भी अलग ’तुरप चाल’ चलते हैं। अक्सर उनके यही वाक्य सुनने को मिलेे हैं, “भई, तुम्हीं तो अकेली नौकरी नहीं कर रही हो और भी तो हैं। उनके लटके तो तुम्हारी तरह नहीं होते। नौकरी करके तुम हम पर कोई अहसान तो नहीं कर रही हो, यदि नौकरी न संभालती हो तो छोड़ दो लेकिन घर की जिम्मेदारी तो निभानी ही होगी।“ बेचारी पत्नी अपना सा मुंह लेकर रह जाती है। उसकी स्थिति बड़ी दुविधाजनक हो उठती है, क्योंकि लगी लगाई नौकरी छोड़ना भी तो इतना आसान काम नहीं है। आमदनी बढ़ने के साथ ही खर्चे भी बढ़ चुके होते हैं, उन पर अंकुश लगाना एक कठिन काम हो जाता है। उसे यही लगता है कि घर में बैठी हुई स्त्रियां उससे ज्यादा सुखी हैं। वे दवाब डालकर पति से अपनी फरमाइश पूरी करवा तो सकती है। यहां तो स्वयं नौकरी करने के कारण अपनी सभी इच्छाएं दबी की दबी रह जाती हैं। पति महोदय उसकी इस भावना को समझने के बजाय उलटे उलाहना अलग से देते है, “अरे भई, तुम्हारा हाथ किसने रोका है, स्वयं कमाती हो तुम्हें किस बात की कमी जो मन में आए करो। “ वह अपने ही पति की ऐसी व्यंगय वाणी सुनकर अपने को हारा हुआ महसूस करने लगती है। उसे ऐसा लगता है कि वह सब कुछ पाकर भी कुछ न पा सकी।                               

ऐसा हो तोयदि कार्यशील बहू को परिवार का जरा सा सहयोग, हमदर्दी और अपनापन मिले तो वह अपनी दिनभर की थकान पलों में भूल जाए। आॅफिस से आते ही अगर प्यार के दो बोल के साथ कोई एक प्याला गर्म गर्म चाय पिला दे तो वह दिन भर की थकान भूल कर खुशी खुशी घर का सारा कामकाज निपटा ले। इसमें ससुराल के सभी सदस्य की बड़ी अहम भूमिका होती है।आखिर, बहू जो कुछ कमा कर लाती है, वह उनके घर के लिए ही तो है। यदि हम अपने घर में एक कामकाजी बहू लाने का सपना देखते हैं तो पहले हमें अपने रवैये में आवश्यक बदलाव लाना होगा, नही ंतो बाद में अनेकों घरेलू समस्याएं हमें घेर लेती हैं। बेटी के नौकरी करने पर घर भर को उसकी सुख सुविधा का ख्याल रहता है। वह थक कर आई है इस बात की चिंता भी मां और घर के अन्य सदस्यों को रहती है। यदि माता पिता व भाई बहन उसका ख्याल नहीं भी रखते हैं तो वह विद्रोह कर उठती है, “मैं कोई यंत्र नहीं हूं कि दिन भर आॅफिस में मेहनत करूं और शाम को घर के काम संभालूं।“ मां यदि कहती है कि, “बेटी यहां तू भले काम करने से इंकार कर दे, लेकिन तेरा यह तेवर ससुराल में नहीं चलने वाला, समझ ले।“ इस पर बेटी का तपाक से जवाब होता है, “ऐसा हो पाना वहां पर भी संभव नहीं है, ससुराल में भी मै इस बात के लिए विद्रोह कर सकती हूं।“उचित सहयोग के अभाव में बहू का भी विद्रोह स्वर उठना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के कारण प्रायः ऐसा देखा जाता है कि पति भी पत्नी के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगते हैं। अन्ततः एक बसे बसाये घर को टूटने में देर नहीं लगती।जहां एक ओर ससुरालवालों को अपनी कार्यशील बहू के प्रति सहयोगपूर्ण व्यवहार रखना चाहिए वहीं दूसरी ओर बहू का व्यवहार भी अपने परिवार के सदस्यों के प्रति बड़ा ही स्नेहिल होना चाहिए। नौकरी करके अपने को ’विशिष्ता’ की श्रेणी में रखकर, पारिवारिक दायित्व से अलग रहकर घरवालों से सहयोग की अपेक्षा करना असंभव है।श्रीमती विभा एक अच्छे पद पर कार्यरत हैं। काफी व्यस्त रहती हैं। पर अपनी इस व्यस्तता के बावजूद अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति सचेत रहती हैं। घर के सभी सदस्यों की भावनाओं का पूरा ख्याल रखती हैं। छोटी ननद को किसी न किसी बहाने उपहार दे देना, सिनेमा दिखा देना, बाहर घुमाना, उसकी मनपसंद की चीजों को खरीद देना, यह सब बड़े हौसले के साथ करती हैं। छोटी ननद भी अपनी भाभी पर निहाल रहती है। विभाजी ज्यों ही आॅफिस से थकी मांदी आती हैं त्यों ही छोटी ननद गर्म चाय नाश्ता लेकर मुस्कराती हुई आ खड़ी होती है। दोनों साथ बैठकर चाय पीते हैं और साथ ही दिन भर की अपनी खट््टी मीठी बातें बताते सुनते हैं। रात का भोजन बनाने में ननद के साथ विभाजी भी लगती हैं। झटपट सारा काम हंसी हंसी में हो जाता है। इस तरह विभाजी की गृृहस्थी की गाड़ी बड़ी अच्छी गति से चल रही है – उनका एक खुशहाल परिवार है।श्रीमती अंजू अपनी वृद्ध सास का पूरा ध्यान रखती हैं। शाम को आॅफिस से लौटने के बाद थोड़ी देर आराम करने के बाद अपनी सासुजी के साथ किचन में हाथ अवश्य बंटाती हैं। सासुजी लाख मना करती हैं, “बहू, तुम दिन भर की थकी मांदी हो, जाओ आराम से बैठो। लेकिन वह सासुजी की एक नहीं सुनती हैं। “अरे, आप भी तो दिन भर बच्चों के साथ लगी रहती हैं, ढ़रों काम भी घर के निपटाती हैं। आखिर आप भी तो थक जाती होंगी।“ कहकर अपनी सासुजी के साथ लगी रहती हैं। अंजूजी मौके मौके पर अपनी सासुजी के लिए कोई न कोई चीज लाना नहीं भूलतीं। सासुजी भी अपनी बेटी तुल्य बहू के व्यवहार से खुशी से फूली नहीं समाती हैं। अभी कुछ ही दिन पूर्व की ही बात है। अंजूजी ने उनके 58 वें जन्मदिन पर एक अच्छी सी साड़ी भेंट की तो वह इतना आत्मविभोर हो गईं कि उनकी आंखों में आंसू छलक आए। अपनी बहू को गले लगाते हुए बोलीं, “बहू, तू तो मेरी बेटियों से बढ़कर है, भगवान सबको ऐसी ही प्यारी बहू दे।“इस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती दोनों को एक दूसरे की भावनाओं को समझना होगा, विचार विमर्श करना होगा और खुलेपन से उसका हल खोजना होगा। किसी समस्या को लेकर चुपचाप घुटते रहना समस्या का हल नहीं और न ही नौकरी छोड़ देना समस्या का उचित समाधान है। समझौता दोनों तरफ से जरूरी है। तभी घर की बहू घर और बाहर का दोहरा दायित्व सुगमता से निभा सकेगी। अतः आवश्यकता है आपसी सहयोग भावना और सूझबूझ की।                       

मनोरमा ब्यूरो द्वारा ।   


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