परिवार में दूसरे बच्चे को ना लाने का निर्णय करने से पहले इकलोते बच्चे की भी राय जरुरी

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बालकनी में अकेला खड़ा पांच साल का पिंकू इधर उधर झांक रहा था, सामने नजर पड़ी तो देखा छवि अपने भाई के साथ खेल रही है। पिंकू भी उसके साथ खेलने के लिए दौड़ पड़ा, कुछ देर तो तीनों बच्चे मिलकर खेलें, लेकिन न जाने किस बात पर बात बिगड़ गई।
“पिंकू , तू जा, हम नहीं खिलाते तुझे अपने साथ।“ छवि और छोटू ने जब यह ऐलान कर दिया तो बेचारा पिंकू एकदम रूंआसा हो गया। किसी तरह आंसूओं को रोकता, मुंह लटकाकर घर में घुसा तो आते ही मम्मी से चिपककर रो पड़ा, “मैं किसके साथ खेलूं ? सब तो अपने भाई बहन के साथ खेलते हैं, आप मेरे लिए कोई बहन क्यों नहीं लातीं ?“
पिंकू की तरह अकेलेपन से ऊबे अनेक बच्चे समय समय पर अपनी इस ऊब की शिकायत करते मिल ही जाते हैं, लेकन इन नन्हे – मुन्नों  की शिकायतों का मम्मी पापा पर कितना असर पड़ता है ? मासूम बच्चों की इस मांग को वे कितना महत्व दे पाते हैं ? अक्सर बच्चे के इस बात का असर उन पर मजाक से ज्यादा और कुछ नहीं हो पाता, जिस पर वे भी हंसते हैं और इधर उधर सुनाकर दूसरों का मनोरंजन भी करते हैं। जहां तक बात महत्व की है, महत्व वे बच्चे की भावना को को न देकर उसे देते हैं, जो वे स्वंय चाहते हैं।
“श्यामा, अब तो तेरी बिटिया बड़ी हो गई है, अब तो“ घबराकर बीच में ही आंटी को टोकती श्यामा बोली, “ना आंटी, दूसरा पैदा करना तो दूर, मैं तो उस बारे में सोच ही नहीं सकती। कौन पड़े फिर आफत में ?“
“प्लीज मम्मी, आप भी लाओ न अस्पताल से मेरे लिए प्यारी सी गुडि़या, जैसी मोनू की मम्मी लायी हैं“, अपनी नन्ही बाहें मम्मी के गले में डालकर जब अंकन ने मम्मी से फरमाइश की तो आरती ने बेटे के अकेलेपन को अंदर तक महसूस किया। शाम को अंकन के पापा से इस बारे में बात की तो अनन्त चिढ़ गया, “पागल हो गई हो ? अंकन तो बच्चा है, लेकन तुम क्यों बच्ची बन रही हो ? यही काम रह गया है क्या ?“
आखिर क्या है इस रूख का कारण ? आज के जमाने में अक्सर मम्मी पापा दूसरे बच्चे के बारे में घबराहट महसूस करते हैं, भाग – दौड़ और महंगाई के इस युग में, जबकि मियां – बीवी दोनों कामकाजी हों और परिवार का रूप इतना छोटा हो गया हो कि घर में देखभाल के लिए किसी बुजुर्ग की छत्र – छाया न हो, तो एक बच्चे की परवरिश से थके मम्मी पापा दूसरे बच्चे का बोझ सहने को बिल्कुल तैयार नही हो पाते – शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से वे टूटना नहीं चाहते। लेकिन सिर्फ अपनी सुविधा और इच्छा को ही ध्यान में रखकर इकलोते बच्चे के प्रति अन्याय करना क्या ठीक है ? कोमल, मासूम बच्चे के दिल की इच्छा को महत्व देना जरूरी है, बच्चे के इस मांग की पूर्ति उसके व्यक्तित्व के विकास में बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है।
प्रोबेशनरी अफसर आकांक्षा तो दूसरे बच्चे के चक्कर में बिल्कुल न थी, लेकिन जब उसे आभास हुआ कि वह दूसरी बार मां बनने जा रही है तो इस अनचाहे मेहमान से छुटकारा पाने के लिए वह अपनी डाॅक्टर सहेली के पास जा पहुंची। सहेली ने काफी समझाया तो वह इस अनचाहे बोझ को ढ़ोने को तैयार हो गई। लेकिन आज दो बच्चों की मां आकांक्षा काफी खुश नजर आती है और बड़े गर्व से दूसरों से भी कहती है, “शुरू में बच्चों को पालने में जरूर कुछ परेशानी हुई, लेकिन अब दोनों बच्चों को आपस में मस्त और खुश देखकर अच्छा लगता है। दोनों एक दूसरे का साथ पाकर इतने प्रसन्न हैं कि उन्हें किसी बाहरी साथ की जरूरत नहीं।“
सच भी है, एक बच्चे का सच्चा साथी दूसरा बच्चा ही हो सकता है। मम्मी पापा उसका साथी बनने का प्रयास भले ही कर सकते हैं, लेकिन सफल नहीं हो सकते। इकलौते बच्चे में अकेलेपन के कारण कई बार ऐसी आदतें पनपने लगती हैं, जो उसके व्यक्तित्व के लिए ठीक नहीं। अकेला बच्चा बहुत ज्यादा पजेसिव हो जाता है। हर चीज में वह सिर्फ अपना ही अधिकार चाहता है जबकि दूसरे बच्चे के आ जाने से उसकी यह भावना कम हो जाती है। धीरे धीरे वह समझने लगता है कि मम्मी पापा पर या घर की अन्य वस्तुओं पर छोटे भाई या बहन का भी उतना ही अधिकार है जितना कि उसका। दो बच्चों के साथ साथ रहने से भले ही उनमें झगड़ा भी हो, किन्तु परस्पर सहयोग तथा समायोजन की क्षमता भी तभी पैदा होती है।
यह न समझिए कि इकलौते बच्चे के लिए आप ज्यादा सुख, सुविधा जुटा सकते हैं और उसकी उचित देखभाल करके उसका समुचित विकास कर लेंगे। आपकी ही सुख – सुविधा और देखभाल के अतिरिक्त उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के लिए जो महत्वपूर्ण है और जिसकी उसे जरूरत है, उसके प्रति आपका नकारात्मक दृष्टिकोण क्या उचित रहेगा ?


                                                          अंशू डबराल। 


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