खाना खाने के तौर तरीके और आपका बच्चा

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मेरी देवरानी अपनी तीन और चार वर्षीय बच्चियों को मेरे पास छोड़कर बाजार गई थी। खाने के वक्त मैंने दोनों बच्चिायों से पूछा, “खाना मैं खिलाऊं या खा लोगी ?“ बड़ी के साथ साथ छोटी भी बोली, “खुद ही खा लेंगे।“ मैंने दोनों की थालियां थोड़ी थोड़ी सब चीजें रखकर अलग अलग परोस दी। दोनों मुझसे बोलीं, “ताईजी, हम नीचे बैठकर खाएंगे।“ मैं देखकर हैरान रह गई। दोनों लड़कियों ने छोटे छोटे कौर बनाकर तमीज से पूरा खाना खाया, न बिखेरा, न ही हाथ – मुंह व कपड़े साने। खाने के बाद बड़ी ने छोटी से कहा, “मिनि, तुम खड़ी हो जाओ, मैं थाली पकड़ाती हूं।“ दोनों ने अपनी अपनी थाली, गिलास रसोई में मांजने की जगह रखे व गुसलखाने में जाकर मुंह हाथ धोकर बैठक में आ गयीं। मुझसे उन्होंने पूछा, “ताईजी, अब हम सो जाएं ?“ बच्चों का संयत व्यवहार व सलीका देखकर लगा देवरानी ने बच्चों को सही व्यवहार सिखाया है। साथ ही, याद आई एक और घटना, जिसने मन ही दुखी नहीं किया था, वरन आपसी रिश्ते में भी कड़वाहट घोल दी थी। मैं व मेरी भाभी बाजार जाने लगे, तो अपने भतीजा – भतीजी को नौकरानी के भरोसे छोड़ गए। हम नौकरानी से कह भी गए कि बच्चों को जब कुछ खाना हो, तो दे देना। जब हम लोग लौटकर आए, तो देखा बाई मुंह फुलाए बैठी है और बच्चे अलग नाराज दिख रहे हैं। कारण पूछने पर पता चला कि बच्चों ने जूठे हाथों से ही रोटी के कटोरदान से पराठे निकालकर खा लिए हैं और जो नहीं खाया गया उसे फिर कटोरदान में रख दिया। बाई ने कटोरदान दिखाया, फ्रिज में रखे आधे – अधूरे खाये सेव, केले दिखाए व कहा, “मैं तो आज खाना खाऊंगी नहीं, सब जूठा हो गया है।“ भाभी ने बच्चों को कुछ नहीं कहा, पर मैंने बच्चों से कहा, “तुम लोगों को जो चाहिए था मांग लेते, खुद क्यों जूठे हाथ खाने में लगाए ?“ बच्चों का जवाब था, “हम तो घर पर भी ऐसे ही करते हैं। हमारी मम्मी तो कुछ नहीं कहतीं, आपकी बाई गंदी है।“बचपन से ही बच्चों को सिखाई गई व्यवहार की अच्छी बातें सारी उम्र उनके काम आती हैं। उन्हें शिष्ट व सलीकेदार व्यक्ति बनाती हैं। यदि मां बाप की यह कामना हो कि बच्चे अच्छे और सभ्य लोगों के साथ उठने – बैठने लायक बनें, सुसंस्कृत कहलाएं, दूसरों से अच्छा व्यवहार करे, तो उन्हें जीवन में प्रतिदिन काम आने वाली व्यवहारिक बातें अवश्य सिखानी चाहिए। अशिष्ट व्यवहार करते बच्चों को देखकर ’चलो छोड़ो बच्चा है, ’ भले ही कह दिया जाए पर मन ही मन कोफ्त जरूर होती है। मन में यह विचार भी आता है कि इनकी मां कैसी है, जिसने बच्चों को कोई ढंग नहीं सिखाया।बच्चे दिनभर में कई बार खाते हैं। बच्चों को यह बताना जरूरी है कि वे कब खाएं, कितना खाएं व क्या खाएं ? कुछ बच्चे पूरे दिन कुछ न कुछ खाते ही रहते हैं। उनका मुंह व मन पूरे दिन चलता रहता है। छोटे बच्चे जिस किसी को खाते देखते हैं, फौरन आकर उसके साथ बैठकर खाने लगते हैं और हाथ पांव सान लेते हैं। मना करो तो दाल चावल फैला देंगे। बच्चों में यह आदत बचपन से ही डालनी जरूरी है कि एक बार बैठकर जो खाना हो, पेट भरकर खा लें। बच्चों के दूध, खाने, फल व नाश्ते का समय निश्चित होना जरूरी है। खाने से पूर्व हाथ धोकर आना, एक जगह बैठकर खाना व उतना ही खाना लेना, जितना वे खा सकें, ताकि जूठन न बचे और खाने के बाद अपने जूठे बर्तन उठाकर रखने की जगह पर रख आना, कुल्ला करना, हाथ धोकर पोंछना भी उन्हें सिखाना जरूरी है। कई बच्चे खाने की थाली देख पहले मचलेंगे, नाक – भौं चढ़ाएंगे फिर कहीं खाना खाएंगे। बच्चों को शुरू से ही अन्न व थाली की महत्ता बताना जरूरी है ताकि वे शांत मन से भोजन करें, खीजते हुए नहीं। थोड़ा बड़ा होने पर बच्चों को परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ ही बैठाकर भोजन कराना चाहिए। चप चप की आवाज न करना, छोटे छोटे कौर तोड़कर मुंह तक ले जाना व खाने में दाहिने हाथ का ही प्रयोग करना, बच्चा दूसरों की देखा देखी सीख जाता है। खाने के समय से पहले बच्चों को बिस्कुट, चाॅकलेट, आइसक्रीम कुछ न दें। इससे वह भोजन के समय खाने से बचना चाहेगा। इससे उसकी खाना खाने की आदत व पुट दोनों ही खराब हो सकते हैं। बच्चे के खाने व दूध का समय निश्चित कर दें। ताकि बच्चे की हर समय मुंह चलाने की आदत न पड़े। उसे भोजन से सभी पोषक तत्व मिले और वह स्वस्थ रहे।दूध पीने से अक्सर बच्चे कतराते हैं। मां बाप भी सोचते हैं कौन इसके संग माथापच्ची करे, एक दिन दूध न पीने से क्या फर्क पड़ता है, पर वास्तव में बच्चे के स्वास्थ्य पर इसका बहुत असर पड़ता है व उसकी आदत भी गंदी पड़ जाती है। बच्चा दूध पीने से जी चुराने लगता है। बच्चे को दूध में चाय, काॅफी या चाॅकलेट जो भी पसंद हो, डालकर दूध जरूर देना चाहिए। तकि वह दूध को स्वाद से पी सके।बच्चे का आहार संतुलित हो, कम मिर्च मसाले का हो व विविधता पूर्ण हो। यह ध्यान रखना मां का कर्तव्य है। यदि बच्चे से पूछकर उसका टिफिन तैयार किया जाए, तो वह स्कूल से भरा डिब्बा वापस नहीं लाएगा। पूरा टिफिन खा लेगा। बच्चे सब सब्जियां खायें, जूठन न छोड़ें व खाते समय तंग न करें, इन सभी बातों का ध्यान रखना जरूरी है। बच्चे को शिष्ट और सौम्य देखकर मां के सलीकेदार होने की पुष्टि होती है।                                               

मंजु नागौरी ।   


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