जरूरी है जीवन में उत्साह का होना

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फिल्म देेखकर जैसे ही ज्योति हाल से बाहर निकली उसने फिल्म की बुराई पीटनी शुरू कर दी, “क्या बकवास फिल्म थी, बेमतलब वक्त और पैसे की बरबादी करना है फिल्म देखना तो।“
रास्ते भर तो बेचारा अतुल बीवी की फिल्म के बारे में नानस्टाॅप कमेंट्री सुनता रहा, लेकिन घर आकर जब ज्योति सर पकड़कर बोली, “ऐसी बोर फिल्म देखकर मुझे तो सिरदर्द हो गया।“ अब गुस्से में भरा अतुल चीखा, “जब से हाॅल से निकली हो यही रिकार्ड गाए जा रही हो, न ही तुम्हारे अंदर कोई उत्साह है और न ही फिल्म देखने की तमीज। तुम्हें लेकर मूड फ्रेश करने गया था, लेकिन तुम्हारे साथ तो मुझे भी सिरदर्द होने लगा, आइंदा अकेले ही फिल्म देख लूंगा, बोर होने के लिए तुम्हें तो भूलकर भी न ले जाऊंगा।“
प्रदीप ने प्रज्ञा से कहा, “चलो इस संडे को कहीं पिकनिक के लिए निकल चलें, बच्चों को भी अच्छा लगेगा और हमारा भी घूमना हो जाएगा।“
प्रज्ञा तुनककर बोली, “न बाबा, इस गरमी में मेरे बस का नहीं कहीं पिकनिक – विकनिक के लिए जाना। पहले ढ़ेर – सा सामान लाद – फांद कर ले जाओ, फिर घर आकर उसे संभालो। थककर फिर रात का खाना बनाने बैठ जाओ, आपको जहां जाना हो जाओ, मैं तो घर में ही ठीक हूं।“
जीवन में उत्साह का होना बहुत आवश्यक है, उत्साहहीनता व्यक्ति को निर्जिव सा बना देती है। उत्साह के अभाव में व्यक्ति उम्र से पहले ही उम्र से ज्यादा नजर आने लगता है। किसी भी काम को अगर उत्साह से किया जाए तो बड़े से बड़ा काम करके भी थकान का अनुभव नहीं होता, बल्कि मन को काम करके अच्छा लगता है। जबकि उत्साह की अनुपस्थिति में छोटे से छोटा काम भी बोझ बन जाता है। अतः जीवन में उत्साह बनाए रखना बहुत आवश्यक है।


आजकल व्यक्तियों में उत्साहहीनता की मात्रा बढ़ती जा रही है, क्योकि आज के मशीनी युग में व्यक्ति भी काफी हद तक मशीनी होता जा रहा है, आजकल वह सब चीजों को यर्थाथ यानि उपयोगिता से मापता है, जिस चीज में बाहर से उसे कोई लाभ नजर नहीं आता, उस चीज को करने में फिर उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रह जाती।
पर अगर छोटी – छोटी बातों में व्यक्ति उत्साह लेने लगे, तो यह उत्साह उसके लिए टानिक का काम करता है, एक नयी शक्ति का संचार उसके अंदर करता है, कई तनावों से ग्रस्त उसके दिल दिमाग को भी तनाव से मुक्त रखता है। छोटी – सी पार्टी, पिकनिक, फिल्म ,टीवी का प्रोग्राम या अन्य किसी काम में उत्साह से भाग लिया जाए, तो एक सुखद अनुभूति व्यक्ति स्वंय अनुभव कर सकता है, जबकि उत्साह के अभाव में बड़ी से बड़ी पार्टी, यात्रा, पिकनिक भी बड़ी नीरस लगने लगती है।
शुरूआती दिनों में उत्साह की मात्रा अधिक होती है, लेकिन उम्र के बढ़ने के साथ उत्साह की मात्रा घटने लगती है। इसका एक कारण तो यह है कि उम्र के बढ़ने के साथ जैसे -जैसे बुद्धि में परिपक्वता आती है, व्यक्ति यर्थाथवादी होने लगता है, अपने जीवन की हर वस्तु को यर्थाथ की दृष्टि से देखने लगता है।
स्कूल काॅलेज के दिनों में विद्यार्थियों में बहुत उत्साह होता है। चुनाव प्रचार, पोस्टर बनाना, जुलूस निकालना, विभिन्न क्रिया कलापों में बढ – चढ़ कर भाग लेने का उनमें उत्साह रहता है। लेकिन धीरे – धीरे उन्हें लगने लगता है इन सबसे कोई फायदा होने वाला नहीं, क्योंकि तमाम आंदोलनों से दुनिया के दुख उन्हें कुछ कम होते  नजर नहीं आते, या परिवर्तन आया भी तो अच्छाइयां नहीं आयीं और फिर घर, गृहस्थी और आॅफिस के चक्कर में व्यक्ति बिना किसी उत्साह के काम करते जाता है। जिंदगी एक औपचारिकता बनकर रह जाती है।

उत्साह कैसे बनाएं
साठ साल के बाबूजी जब लगती बारिश में छाता लेकर घर से बाहर निकले तो सीमा के पास बैठी पड़ोसिन आंटी से चुप न रहा गया। सीमा से उसने पूछ ही लिया, “बिटिया ऐसी किस चीज की जरूरत पड़ गई, जो इस बारिश में बूढ़े बाबूजी को बाजार भेज दिया ?“
सुनकर हंसने लगी सीमा, “आंटी बाबूजी कोई सामान लेने नहीं घूमने गए हैं। बाबूजी के अंदर अब भी बच्चों का – सा उत्साह भरा है, बारिश में घूमने में उन्हें बहुत मजा आता है, बांध में पानी कितना ऊपर चढ़ गया है। रास्तों में कितना पानी भर गया है यह सब देखना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। किसी झाड़ी में खिला कोई जंगली फूल अगर उन्हें अच्छा लग गया तो वे वहीं जाकर उसे देखने लगते हैं, हमसे दुगनी उम्र में भी हमसे कई गुना ज्यादा उत्साह है।“
यह तो थी साठ साल के बाबूजी के उत्साह की बात, इस उम्र में अगर आप भी अपने उत्साह में कमी पाती हैं, तो अपने अंदर उत्साह का संचार करने के लिए अवश्य प्रयत्न कीजिए।
इसके लिए अपने वातावरण में रूचि लीजिए। बच्चों की जैसी स्वाभाविक दृष्टि से भी चीजों को देखिए। प्रायः हम अपनी व्यस्तताओं में फंसकर इतने स्वार्थी हो जाते हैं, कि हमारी आंखें इन चीजों को देख ही नहीं पातीं। छोटी -छोटी चीजों में भी खूब उत्साह से भाग लीजिए।
घर की छोटी पार्टी, घर की सजावट, भोजन बनाने मे रूचि लेना, टीवी के कार्यक्रम देखने में उत्साह से भाग लेना, किसा सामाजिक या राजनीतिक महत्व के विषयों पर आप संगठन भी बना सकती हैं। यह जरूरी नहीं कि किसी सफलता की कामना से ही यह सब किया जाए, सिर्फ उत्साह को बनाए रखने के लिए भी यह सब किया जा सकता है।
                                                         

मनोरमा सेल


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